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Thursday, April 26, 2018
शब्दों की समाधि
कंचन पाठक
कवियित्री, लेखिका

मखमली कोमल काया तेरी,
चादरें महताब-सी चिकनी
ओ मासूम खगी
अद्वैत का अमर संगीत सुनती और गुनती
उस अनुपम रागिनी को सुनने गुनने के क्रम में
उतर आती वही अमर ध्वनि तेरी आत्मा के स्वर में भी
भूख के तन पर लिखी खून के रंग की इबारत
पढ़ने में असफ़ल हो जाती अनुरागी आँखें 
ऊँचे-ऊँचे काले साए चाबुकजनी करते
गुलाबी रंगों को स्याह करते जाते
अस्वाभाविक रूप से दिशाओं की रंगत का मलिन हो जाना
और तिस पर तड़ित्क्षणों में आँखों को निर्जन कर देने वाला
वहशियाना अंदाज़
निर्वासित शब्दों की लग जाती समाधि ...
विद्रूप की जलती बालुकाओं से होने वाला मनोभंग
जीवन-भय सी अनुभूतित होती रोंगटे खड़े करनेवाली
असाधारण भावभंगी की प्रतित्छाया ...
गद्देदार पैरों को बिना आवाज़ के जमीन पर रख
सधी चाल चलनेवाले ऊदबिलाव की फ़ह्हाश चश्मेबद
ठठाकर हँसता प्रत्याशा का कलंक
हिंसात्मक प्रहार पर मुस्कान का आवरण 
और उस मुस्कान के पीछे छुपा निर्दोष मछलियों का खून
विहग-बाला की वनचंपा-सी आँखों में हलकान हुआ जाता
संवेदनाओं का शव ...

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विवेक तिवारी,कानपुर
अति सुंदर...भावपूर्ण...