Thursday, December 13, 2018
सच्चे सेंटा क्लाज
दिनेश शुक्ला
पत्रकार,भोपाल

सरदार दयाल सिंह सलूजा...जी हां यही नाम है भोपाल के सच्चे सेंटा क्लाज का, यह परंपरागत सेंटा की वेशभूषा में सिर्फ बच्चों के लिए क्रिसमस पर उपहार लाने वाले सेंटा जैसे भले न दिखते हों लेकिन वे पूरे साल हर दिन लोगों के लिए किसी सेंटा की तरह ही राहत की शक्ल में खुशी की सौगात देते हैं । छोटी सी उम्र में पाकिस्तान से भारत पहुंचे सरदार दयाल सिंह सलूजा ने मानव सेवा को ही अपना धर्म बना लिया । एक सेंटा की तरह सरदार दयाल सिंह लोगों की मदद में लगे रहते हैं । लोगों की मदद के लिए दयाल सिंह ने एक सेवा ट्रस्ट की स्थापना भी की है जहाँ लोगों को खाने के अलावा मरीजों को निशुल्क दवाईयाँ और खून मिलता है । 94 साल के सरदार दयाल सिंह जी कहते है कि सेवा में बरकत है ।



सरदार जी अपनी पत्नी गुरदीप सिंह सलूजा के साथ जब 1961 में इंदौर पहुँचे तो वहाँ उनके सबसे छोटे बेटे सतेन्द्र सिंह का जन्म हुआ । अपने छह भाई बहिनों में सबसे छोटे सतेन्द्र सिंह बताते है कि उन्होनें जबसे होश सम्हाले है बाबू जी को हमेशा लोगों की सेवा करते हुए ही देखा है । चाहे किसी को खाने की जरूरत हो, कपड़ों की यह फिर इलाज की बाबूजी हमेशा सब कुछ छोड़कर उसकी मदद में लग जाते हैं। सतेन्द्र सिहं बताते है जब उनका परिवार मुफलसी के दौर में था तब भी बाबू जी अपनी जेब से लोगों की मदद करते थे।





अपने जीवन के 94 बसंत देख चुके दयाल सिंह सलूजा आज भी लोगों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। वर्षों से दीन दुखियों की सेवा में लगे दयाल सिंह ने जब भोपाल के कई अस्पतालों में बीमार और लाचार लोगों को कई कई दिनों तक इलाज के लिए आकर रूकते देखा और पैसे के अभाव में उन्हें खाने के लिए इधर उधर भटकते देखा तो 1994 में भोपाल के हमीदिया अस्पताल में बाहर से आए मरीजों और उनके परिजनों के लिए खाने का इंतजाम किया । जो आज तक बदस्तूर जारी है । यहाँ हर रोज 500 से ज्यादा लोग भोजन करते हैं।





सरदार दयाल सिहं सलूजा के इस सेवा भाव को देखकर उनके साथ पहले श्याम किशोर शुक्ला और प्रकाश कौर खनूजा तथा रश्मि बावा ने मिलकर प्रेरणा संस्था सेवा ट्रस्ट की शुरूआत की । सरदार दयाल सिंह के सेवाभाव से प्रभावित होकर अपनी बैंक की नौकरी छोड डी.एस. अरोरा भी प्रेरणा सेवा ट्रस्ट से जुड गए। डी.एस. अरोरा बताते है कि दयाल सिंह जी लोगों की सेवा में न दिन देखते है न रात और कभी कभी तो लोग उन्हें गालियाँ तक दे देते हैं लेकिन वह निष्काम भाव से लोगों की सेवा में जुटे रहते हैं।





सरदार दयाल सिंह उम्र के इस पडाव में भी रोज अपनी बहू कमलदीप के साथ भोपाल शहर में दीन हीन लोगों की सेवा में जुटे रहते हैं। भले ही क्रिसमस को सेंटा दोनों पैरों से लाचार इंद्राबाई और प्रमिलाबाई के यहाँ उपहार लेकर न पहुँचे लेकिन सरदार दयाल सिंह वह सेंटा है जो हर महीनें इन दोनों के घर राशनपानी से लेकर उनकी जरूरत की चीजें पहुँचाते हैं। यह सिलसिला वर्षों से लगातार यू ही जारी है। सिर्फ इंद्राबाई और प्रमिलाबाई ही नहीं ऐसे कई लोग हैं जो अपने सेंटा सरदार दयालसिंह का इंतजार करते हैं कि मेरा सेंटा आएगा और सेवाभाव के साथ उनकी फरमाईश पूरी करेगा। सरदार दयाल सिंह के इसी सेवा भाव पर एक शेर बखूबी उन पर सटीक उतरता है -

ये और बात है कि आँधी हमारे बस में नहीं,
मगर चराग जलाना तो इख्तियार में है ।

 

 

सरदार दयाल सिंह के सेवा अभियान पर अपनी राय लिखिये ।


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   Comments
रंजीत सिंह,ग्वालियर
प्रेरणादायक लेख...
 
राजकमल त्रिपाठी
मानव सेवा की मूर्ति...दयाल सिंह जी जैसे सेवा भाव मानवता के लिए जरूरी है.
 
keshav
nice story
 

Blessed to have u in our life n may god keep u healthy so that you can serve more
 
दिनेश शुक्ल
वह सच्चे संत थे...एक माह पहले वह पहले वह मानव सेवा करते हुए उस परमपिता परमेश्वर में लीन हो गए...श्रृद