Thursday, June 21, 2018
गणित का गौरवशाली भारतीय इतिहास
शारदा शुक्ला
पत्रकार,लेखिका(पुस्तक कलम की कॉकटेल से साभार))

गणित का गौरवशाली भारतीय इतिहास               
               
ये सभी वास्तु और सिविल इंजीनियरिंग संबंधी सफलताएं गणितीय ज्ञान और नाप-जोख की समुचित प्रणाली के बिना संभव नहीं थीं । भारतीयों के गणित का ज्ञान अति प्राचीन होने के साथ ही साथ काफी उन्नत भी था । सर्वप्रथम शुल्व सूत्र नामक उत्तर वैदिक कालीन पुस्तक से हमें भारतीयों के रेखागणितीय ज्ञान की जानकारी प्राप्त होती है । शुल्व का अर्थ होता है नापने की डोरी । 
         काफी लंबे समय से ये भ्रामक विचार लोगों के मस्तिष्क में था कि संख्याओं की दशमलव प्रणाली अरबवासियों ने खोजी थी परन्तु ये सत्य नहीं है । अरबवासी स्वंय गणित को 'हिन्दिस्त' नामक भारतीय कला कहते थे । यदि दशमलव प्रणाली मौजूद न होती तो आज तक जिनती भी वैज्ञानिक खोजें विश्व में हुई हैं संभवत:उनमें से एक भी न हो पाई होती । संख्याओं की दशमलव प्रणाली की खोज करने वाले महापुरुष का नाम तो किसी को मालूम नहीं लेकिन यह तय बात है कि वो भारत मां की लायक संतान रही होगी और उसे जितना सम्मान आज तक मिला है वो उससे कही ज्यादा का अधिकारी है ।


                              
 सातवीं शताब्दी के ब्रह्म गुप्त , नवीं शताब्दी के महावीर और बारहवीं शताब्दी के भास्कर जैसे गणितज्ञों ने कई ऐसी खोजें कीं जो यूरोप को रिनेंसा काल तक ज्ञात नहीं थीं । भारतीय गणितज्ञ धनात्मक और ऋणात्मक परिणामों का तात्पर्य जानते थे । उन्होंने वर्गमूल तथा घनमूल निकालने की ठोस प्रणाली को जन्म दिया । ये गणितज्ञ वर्ग समीकरण अर्थात् स्क्वायर इक्वेशन तथा अन्य प्रकार के अनिश्चित समीकरणों का उत्तर निकालना जानते थे । आर्य भट्ट ने 'पाई' का वही मूल्य 3.14 दिया जो आधुनिक शुद्धतम मूल्य है । 'पाई' की वैल्यू को भारतीय गणितज्ञों ने दशमलव के 9 स्थानों तक शुद्द किया था । जीरो के गणितीय अर्थ और असंख्यता अर्थात इनफिनिटी के बारे में उच्चकोटि के विदेशी विद्वानों को अस्पष्ट से अधिक ज्ञान नहीं था परन्तु प्राचीन भारतीय गणितज्ञों को इसके गणितीय अर्थ की जानकारी थी ।

                                                       सर्वप्रथम भास्कर ने ही सिद्द किया था कि 0/क = 0 अर्थात् शून्य को किसी संख्या से भाग देने पर शून्य ही उत्तर आता है । ये बात जो भास्कर में गणितीय समीकरण के माध्यम से कही वही बात उनके समय से तकरीबन एक हजार से पंद्रह सौ वर्ष पूर्व
वेदांतों में कही जा चुकी थी । भास्कर को गणित की एक पुस्तक 'लीलावती' की रचना का श्रेय भी जाता है । ब्रह्म गुप्त ने भी एक पुस्तक की रचना की थी जिसका नाम था 'ब्रह्म सिद्धान्त ' । इस पुस्तक का अरबवासियों ने अरबी भाषा में 'सिंध-हिंद' नाम से अनुवाद किया था ।श्रीधराचार्य और रामानुजाचार्य भी प्राचीन भारतीय गणितज्ञों में विशिष्ट स्थान रखते थे ।

 

 

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   Comments
deepak chaudhary...
very nice story bhaiya, may be in sabhi stories ko padh kar log inspire honge aur problems ko face karne se darenge nhi
 
Harsh
शुक्रिया दीपक जी