Thursday, December 13, 2018
कुछ और पाने की चाहत में
संघर्ष अग्रवाल
कवि

कुछ और पाने की चाहत में

जवानी बीत गयी बुढ़ापा ठहर गया

समेटने में बस लगे रहे , जीवन बिखर गया

सुबह हुई कब रात ढली, फ़ुर्सत फिर भी मिली नहीं

ना रुकने की दौड़ चली, छुट्टी जिसमें मिली नहीं

                       कुछ और पाने की चाहत में

अल्हड़पन सब खो सा गया, तू समय मुसाफ़िर हो ही गया

स्टेटस की चाह में , खुद से दूर तू हो ही गया

कुछ बेमतलब की बातों पर तू हंसी दिखाया करता हैं

कुछ अनजाने चेहरों के संग तू समय बिताया करता हैं

                      कुछ और पाने की चाहत में

घर लौट भी आ अब शाम हुईं, तकिया तुझे बुलाता हैं

वो व्यंजन की खुशबू, वो दोस्त तेरे और जिनसे तेरा नाता हैं

बचपन का मोल चुकाकर के तूने इस खेल को जाना हैं

तू थक जायेगा जीत-जीत, पर खेल तो चलते जाना है

                      कुछ और पाने की चाहत में

सपने पूरे करते-करते, तू उनसे दूर निकल आया

जीरो की अँधेरी दुनियां में, कितने ज़ीरो तू धर आया

पर उम्र में जीरो ना जुड़ते , कही बीत जाएँ तो ना हो गम

सावन छोड़ा, पतझड़ छोड़ा तूने छोड़ दिया है हर मौसम

                      कुछ और पाने की चाहत में





 

 

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