Tuesday, August 21, 2018
देवता और हम: श्रेष्ठ कौन ?
रघोत्तम शुक्ल
लेखक,कवि एवं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी

हमारे प्राचीन ग्रन्थों में मनुष्येत्तर विभिन्न योनियों के संदर्भ, उल्लेख और वर्णन है ।
देवता, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, चारण, सिद्ध, असुर, वसु आदि इनके उदाहरण है ।
देवता सामान्यतय: सर्वगुण सम्पन्न, समस्त सुन्दर भोगों को करने वाले तेजोमय
अजर-अमर प्राणी मान जाते है, जिनका निवास स्वर्ग है।

                     
                                                                          देव, मनुष्यों के लिए उपमान और आदर्श हैं, सामान्यतय: स्वर्ग मानव का अभीष्ट । उन्हें पृथ्वी पर अन्य सभी जीवों से श्रेष्ठ तथा परंब्रह्म परमात्मा के सहयोगी व कनिष्ठ अधिकारी के रूप में समझा जाता है। इनकी संख्या 33 करोड़ कही गई है। इनमें 12 प्रमुख हैं जो अदिति के पुत्र है। इन्हें आदित्य कहते है तथा विवस्वान, आर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरूण मित्र, उरूक्रम आदित्यों में
विष्णु (उरूक्रम) सर्वश्रेष्ठ हैं। वृहदारण्यकोपनिषद में याज्ञवल्कय ने साकल्य से देवताओं
 की संख्या 33 बतलाई है। उन्होंने देवताओं को अनेक रूप धारण करने वाला भी बतलाया है।
        
                                         सभी देवताओं के नायक इन्द्र हैं जिन्हें सुरेश, शक्र, सुनाशीर भी कहते हैं । इनकी पत्नी "शची" है। स्वर्ग तरह-तरह के सुख भोगों की खान है, अप्सराय वहां नृत्य
करती हैं । मनोवांछित पदार्थ उपलब्ध हैं। वहां के उद्यान अति नयनाभिराम हैं। श्रीमद् भागवत में वैश्रम्भक, सुरसन,नन्दन, पुष्पभद्र, मानस, चैज्ञरथ नामक देवोद्यानो का उल्लेख  है।

                                          देवों के विषय में प्रसिद्ध है कि उनके चरण भूमि को स्पर्श नहीं करते, उनकी पलकें नहीं झपकतीं, उनका सौंदर्य यथावत रहता है और उनके गले की पुष्पमाला अम्लान रहती है। वे यों तो सूक्ष्म देहधारी है किन्तु आवश्यक्तानुसार इच्छित देह धारण कर लेते हैं। उनमें वरदान देने की भी शक्ति है ।

                                                   कुंती के कर्ण, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन क्रमशः सूर्य, धर्म, वायु और इन्द्र के वरदान से उत्पन्न हुए, श्रुतियों और स्मृतियों के वर्णन से स्पष्ट होता है कि देवता पदाधिकारी हैं और हर कल्प के आदि में निश्चित नाम रूप एश्वर्य वाले देवता, ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं उनमें जीव बदल जाते है, अतः देवों के जीव नश्वर होते हुए देव अनादि और नित्य हैं ।
                             
 
                                                 देवताओं और मनुष्यो में एक सह-संबंध है। हम उन्हें भोगार्थ यज्ञ का भाग व अन्य अच्छे पदार्थ अर्पित करते हैं और वे हमें अपनी सूक्ष्म और प्रभावी शक्ति से मनोवांछित फल देते है। सृष्टि सृजन के समय मानवता के पितामह ब्रह्मा जी ने ऐसा ही आदेश दिया। गीता के तीसरे अध्याय में श्लोक संख्या 11 और 12 में प्रजापति ब्रह्मा का मनुष्यों के नाम संदेश दिया गया है जिसका सरल हिन्दी में काव्यानुवाद इस प्रकार है-
                 
                              "करो यज्ञ के द्वारा ही तुम सदा देवगण की उन्नति।
                               तथा देवता भी तुम सबकी  करते रहें सदैव प्रगति ।।
                              हे प्रिय प्रजाजनो यह उत्तम पथ जब तुम अपनाओगे । (11)
                               करते हुए परस्पर उन्नति परम श्रेय पा जाओगे ।
                                इच्छित भोग प्रदान करेंगे देव यज्ञ भावित होकर,
                               अर्पण बिना किये उनको जो भोग करे वह नर तस्कर । " (12)
                                                                                   (गीता दोहन से)
                                              इस प्रकार दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । कुछ विशेषतायें उनमें हैं कुछ हममे हैं। यहां जब हम देवताओं और मनुष्यों का तुलनात्मक वर्णन करते है तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश की की बातें नहीं उठाते, क्योंकि यह बृहत्रयी से विराट का ही रूप हैं और हमारी उनसे तुलना नहीं हैं। मनुष्य जिन्हें अपने आदर्श और जिस लोक को (स्वर्ग) अपना अभीष्ट गन्तव्य मानता है, वह वास्तव में वैसा  नहीं है जैसा ऊपर से समझ में आता है।

                                                 देव भी पूर्ण ही हैं। वे सूक्ष्म देह धारी हैं और स्थल भोग नहीं कर सकते, वे हमारे अर्पण पर निर्भर करते हैं । उस स्वर्ग की प्राप्ति अखण्ड सकाम पुण्यों के प्रतिफलस्वरूप मिलती है और पुण्य क्षीण होने पर मृतलोक में वापस आना पड़ता है।
 
                            राजा नहुष का इन्द्र पदवी पाना और महान पाप करने पर पुण्य क्षय की स्थिति हो जाने  पर शापित हो पृथ्वी पर सर्प हो जाने की कथा प्रसिद्ध है । समय-समय पर देवता भी अपने चरित्र से विचलित हुए हैं और मानवता (विशेषकर ऋृषियों ) ने उनहें अभिशप्त किया है। उनकी योनि भोग योनि है ,उन्हें कर्म का अधिकार नहीं है जो केवल हमें प्राप्त है। हम स्थूल भोग कर सकते हैं थोड़े ही दिन सही। इसके अतिरिक्त मनुष्य का अंतिम लक्ष्य नश्वर स्वर्ग नहीं बल्कि मोक्ष है जो देवताओं का भी लक्ष्य है। कुछ श्रुतियों में देवताओं का भी कर्म में और ब्रह्म विद्या में अधिकार बताया गया है। उदाहरणार्थ- "देवा वै सत्रमासत "( तै सं 21313) की श्रुति से स्पष्ट है कि देवों ने यज्ञ का अनुष्ठान किया।
 
          

                                                      इसी प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद में उनका ब्रह्मा विद्या में भी अधिकार बताया गया है। आचार्य वादरायण भी इसकी पुष्टि करते हैं, किन्तु इस बिंदु पर बात यह सही लगती  है कि कर्म क्षेत्र केवल पृथ्वी है, देव लोक नहीं , ब्रह्म विद्या का पुरुषार्थ और कर्म मनुष्य ही कर सकता है । विलासी और अशरीरी देव नहीं । "शरीर माध्यम्  खलुधर्मसाधनम् " अर्थात शरीर( स्थल देह) ही धर्म का साधन है ।
                           
                                                आचार्य जैमिनी का मत भी यही है कि देवगण का कर्म औऱ मधु विद्या में अधिकार नहीं हैं। ब्रह्मसूत्र पाद अध्याय 3 के 31 वें सूत्र में लिखा है - "मध्वा दिष्वसम्भवादनधिकारं जैमिनी "। मनुष्य में काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे विकार होते हैं, आज का मनुष्य कुछ अधिक ही स्वार्थपरता और विकर्मों में लीन है, वह भौतिक उपलब्धियों के अम्बार हर कीमत पर लगाकर अपने को सुखी बनाना चाहता है जिससे उसकी छवि मलिन हो गई है।  हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गये हैं ।

                                               इतिहास और पुराण साक्षी हैं कि मानव वीर देवताओं के सहायतार्थ रण करने जाते रहे हैं। दशरथ और मुचकुन्द जैसे वीरों को कौन नहीं जानता जिन्होंने असुरो से युद्ध में देवताओं की सहायता की । तेजस्वी पुरुरवा वीर अर्जुन और तपस्वी विश्वामित्र की सेवा में देव रमणियां उपस्थित हुईं, दिनकर जी कहते हैं -
         
            "नर के वश की बात देवताओं बने कि नर रह जाये ।
            रुकें गंध पर या बढ़कर फूलों को गले लगाये ।।
             परसुर बने मनुज भी वे यह स्वत्व ना पा सकते हैं ।
            गंधों की सीमा से आगे देव ना जा सकते हैं "।।

                                         यदि हम विकारों को त्याग कर विकर्मों  से दूर रह संयमशाली बनें और नित्यकाम सत्कर्मों  से सुपथ पर अग्रसर हो जायं तो पुराण कल्यित स्वर्ग पृथ्वी की तुलना में तुच्छ तथा श्रुति वर्णित देवगण से हम हर तरह से श्रेष्ठ हैं ।

 

 

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   Comments
प्रशांत,मिर्जापुर
जानकारी से भरपूर और बेहद रोचक लेख ।