Tuesday, August 21, 2018
यूपी का सिनेमा
शारदा शुक्ला
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखिका


हम आपमें इतने छेद करेंगे कि आप कन्फ्यूज हो जाओगे के खाए कहां से और.....कम्माल
करते हो पांडे जी अभी भी नहीं समझे कि कि हम दबंग फिल्म की बात कर रहे हैं। खाली दबंग की ही क्यों, हम बात करते हैं बंटी और बबली,तनु वेड्स मनु,बुलेट राजा, इश्किया,इस्कजादे, उमराव जान, अंजुमन,नदिया के पार और मेरे हुजूर,मेरे महबूब, चौदहवीं का चांद की भी। क्योंकि इन सभी फिल्मों में एक समानता है, वो ये कि ये सभी फिल्में उत्तर प्रदेश में ना केवल बनी बल्कि इनकी कहानियों में भी यूपी की संस्कृति की झलक और यहां का सोंधापन है।




अब सवाल ये उठता है कि जब उत्तर प्रदेश पर बनी फिल्में इतनी पसंद की जाती है तो क्यों यहां का फिल्म उद्योग दक्षिण भारतीय या भोजपुरी फिल्मों की तरह पनप नहीं पा रहा। जबकि वर्तमान सदी में भारतीय सिनेमा, हॉलीवुड और चीनी फिल्म उद्योग के साथ एक वैश्विक उद्योग बन गया। भारतीय सिनेमा ने 90 से ज़्यादा देशों में बाजार बनाया है जहाँ भारतीय फिल्में प्रदर्शित होती हैं। ऐसे में क्या उत्तर प्रदेश को अपने हिस्से का लाभ नहीं उठाना चाहिए ?



 

ऐसा नहीं है कि इस दिशा में प्रयास हुए नहीं हैं....आजादी को कट प्वाइंट माने तो बीते वर्षों
में कई सरकारों ने प्रदेश में फिल्म उद्योग स्थापना के प्रयास किए, लेकिन वो विफल ही साबित हुए हैं। आजादी के बाद फिल्म अभिनेता सुनील दत्त ने 1967 में उत्तर प्रदेश में फिल्म उद्योग स्थापित करने के लिए अनुकूल माहौल बताया था। चंद्रभानु गुप्त ने भी उप्र में फिल्म उद्योग स्थापित करने के प्रयास किए, लेकिन सरकार गिरने के साथ ही यह प्रयास भी दम तोड़ गए।
 

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इसके बाद वी.पी. सिंह सरकार ने सूबे में फिल्मों को बढ़ावा देने के लिए उप्र में चलचित्र निगम की स्थापना की और फिल्म बनाने वालों को उपकरण एवं सब्सिडी के तौर पर तीन लाख रुपये देने की घोषणा की। इसके अलावा कुछ सप्ताह तक प्रदेश में फिल्म को मनोरंजन कर से मुक्त रखने का ऐलान भी किया गया,लेकिन नौकरशाहों की लचर कार्यशैली के कारण चलचित्र निगम बंद हो गया। जिसके बैनर तले सिर्फ एक फिल्म "कर्म कसौटी" 1990 में बनी, जो कभी रिलीज ही नहीं हो सकी। नतीजतन चलचित्र निगम के महंगे उपकरण कौडियों के दाम बेच दिए गए।




1984 में एक बार फिर तत्कालीन सूचना राज्यमंत्री प्रमोद तिवारी ने मुंबई के निर्माताओं की बैठक में उप्र में फिल्म उद्योग लगाने की घोषणा की। कहा गया कि लखनऊ के इंदिरा नगर में स्टूडियो और प्रयोगशाला बनाई जाएगी, लेकिन यह घोषणा भी नौकरशाही ओर नेताओं के बीच खींचतान के कारण पूरी नहीं हो सकी। भाजपा की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्ता ने फिल्म बंधु की स्थापना की। शत्रुघ्न सिन्हा फिल्म बंधु के पहले अध्यक्ष बनाए गए।
बाद में अनुपम खेर इसके अध्यक्ष बने। जया बच्चन भी फिल्म बंधु की अध्यक्ष रह चुकी हैं।

 
इतनी नामचीन हस्तियों के फिल्म अध्यक्ष बनने के बाद भी प्रदेश में फिल्म उद्योग का सपना,सपना बनकर ही रह गया। सिनेमा हाल बंद होते गए और दर्शक सिनेमा घरों से रूठे रहे। मायावती सरकार बनने के बाद यशवंत निकोसे फिल्म बंधु के अध्यक्ष बने किंतु फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कोई ठोस काम नहीं हो सका।



इसके बाद उत्तर प्रदेश में फिल्म उद्योग को बढ़ावा देने के लिए अखिलेश यादव सरकार द्वारा नीति में किए गए बदलाव से इस बात की उम्मीद बढ़ी कि प्रदेश में अब फिल्म उद्योग के अच्छे दिन आने वाले हैं। इसके तहत वर्ष 2001 में जारी फिल्म नीति में संशोधन कर प्रदेश में बनने
वाली हिंदी फिल्में, जिनमें अवधी, ब्रज, बुंदेली एवं भोजपुरी सम्मिलित हैं, जिनकी कम से कम 75 प्रतिशत शूटिंग उप्र में की गई हो, तो उन्हें लागत का 25 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा। अनुदान की सीमा प्रत्येक फिल्म के लिए एक करोड़ रुपये तक होगी।


साथ ही राज्य सरकार प्रदेश में प्रत्येक वर्ष फिल्मोत्सव कराने पर भी विचार कर रही है। इसका मकसद उच्च श्रेणी की राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों को राज्य के आम आदमी की पहुंच में लाने के लिए सार्थक प्रयास करना है. इससे सूबे में स्वस्थ सिनेमा संस्कृति का विकास होगा तथा फिल्म उद्योग के विकास के लिए एक व्यापक आधार तैयार होगा। फिल्मोत्सव का आयोजन, उद्योग, सूचना, पर्यटन, मनोरंजन कर तथा संस्कृति विभागों द्वारा संयुक्त रूप
से किया जाएगा।




इन सबके अलावा प्रदेश में हैदराबाद के रामोजी फिल्म सिटी के तर्ज पर एक फिल्म सिटी का निर्माण किया जाना चाहिए,जो नोएडा फिल्म सिटी की तरह एक औपचारिकता मात्र ना हो। आधुनिक तकनीक से लैस अच्छे स्टूडियोज से इसकी पहचान हो,फिल्म निर्माताओं को काम करने,ठहरने,सुरक्षा तथा यातायात आदि की अच्छी व्यवस्था मुहैया कराई जाए। इसके लिए सरकार को चाहिए की वो देश विदेश के बड़े औद्योगिक घरानों,फिल्म निर्माताओं को अनुकूल माहौल का आश्वासन दे जिससे वो अपना पैसा और प्रतिभा प्रदेश में इनवेस्ट करने को राजी हो।



फिल्म बंधु की साइट भी देखे - http://filmbandhuup.gov.in/hi


साथ ही प्रदेश के कलाकारों और आम जनता को भी सोच बदलने की जरूरत है।जरूरत है हर स्तर पर एक मंजे हुए व्यवसायिक द्रष्टिकोण की जिसके बाद उम्मीद की जा सकती है कि महानायक अमिताभ बच्चन, संगीतकार नौशाद अली और गीतकार जांनिसार अख्तर,खुमार बाराबंकवी और शकील बदायूंवनी पैदा करने वाली धरती पर सिनेमा का आने वाला कल
स्वर्णिम साबित होगा....क्योंकि सवाल सिर्फ उद्योग का नहीं प्रदेश की प्रतिभाओं के विस्फारण का भी है।

 

 

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