Thursday, July 19, 2018
थलाइवा
अल्पियू सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

पिछले कुछ समय से राजनीति में एंट्री का ट्रेलर दिखा अब जबकि रजनीकांत राजनीति की फिल्म रिलीज कर ही चुके हैं तो अब सबकी नजर इस बात पर है कि इस फिल्म के  क्रेडिट रोल में  निर्देशक और  प्रोड्यूसर की जगह किस राजनीतिक दल का नाम होगा। डीएमके और एआईएडीएमके की हालत खस्ता होते देख रही बीजेपी तमिलनाडु में सेंध लगाने के लिए तैयार बैठी है। पिछले साल की शुरुआत में नितिन गडकरी और अमित शाह ने रजनीकांत के लिए पलक पांवडे बिछा दिए थे। ये फीलर्स बीजेपी रजनीकांत को 2014 से ही दे रही है,जब अपने चुनाव प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी ने रजनीकांत से मुलाकात की थी। इसलिए जब रजनीकांत ने पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सुंदरराजन ने फटाफट प्रतिक्रिया दे दी कि 2019 में रजनी बीजेपी के साथ ही मिलकर लड़ेंगे।





ये अलग बात है कि अब तक रजनी ने खुद खुलकर कुछ नहीं कहा है। ये रजनी का अंदाज़ ए बयां है,वो हमेशा से ही लोगों को अटकलें और कयास लगाने के मौके देते हैं। यही वजह है कि वक्त के साथ वो अपनी राजनीतिक राय भी बदलते रहते है। बात 1996 की है,जब तमिल मनिला कांग्रेस और डीएमके साथ चुनाव लड़ रहे थे,उस वक्त रजनीकांत ने एक टीवी इंटरव्यू में ये कहकर हलचल मचा दी थी कि अगर जयललिता फिर से जीतकर आई तो तमिलनाडु को भगवान भी नहीं बचा पाएंगे लेकिन 2004 में जयललिता से संबंध सुधारने की कवायद भी लोगों ने देखी और सुनी। रजनी किसे वोट करते हैं, किस का समर्थन करते हैं इस को लेकर एक विवाद 2011 में भी सामने आया था जब विधानसभा चुनाव के दौरान  टीवी कैमरों ने वोटिंग करते ने उनकी उंगलियां एआईएडीएमके के चुनाव चिन्ह के इर्ग गिर्द कैद की हालांकि बाद में करुणानिधि को ये कहना पड़ा कि वो तो वोट का निशान बना रहे थे।





दक्षिण के पापुलर मास कल्चर पर रजनीकांत के असर को देखते हुए बीजेपी और डीएमके दोनों चाहेंगे कि रजनी उनके साझीदार बनें,उसकी वजह भी है भले ही रजनी की पार्टी नई होगी,लेकिन उनके पास रजनीकांत फैन क्लब के नाम से राज्य के हर जिले में वफादार संगठन है,जो उनकी बड़ी ताकत है। हालांकि डीएमके नेता स्टालिन ने इशारों ही इशारों में रजनीकांत की आध्यात्मिक राजनीति वाले शिगूफे की हवा निकाल दी है। जिस दिन रजनीकांत ने पार्टी का ऐलान किया उसी दिन उन्होंने ये भी कहा कि उनकी राजनीति का आधार आध्यात्मिक राजनीति होगी। कुछ लोगों ने इसे बीजेपी के साथ निकटता का संकेत भी माना,जिसके बारे में स्टालिन ने कहा कि इस आधार पर उनको सफलता इसलिए नहीं मिल पाएगी क्योंकि ये तमिलनाडु की राजनीति द्रविड़ आंदोलनों का उद्गम स्थल रहा है, हालांकि कई जानकार इसे रजनी का एक शुरुआती स्मार्ट मूव मान रहे हैं,उनका कहना है कि ऐसा कह उन्होंने जातिवाद में फंसी तमिलनाडु की राजनीति से खुद को बचाने की चाल चली है,और इसे बीजेपी से निकटता का संकेत ना माना जाए।




ये अलग बात है कि आध्यात्मिकता में उनकी गहरी रूचि है,और इसकी जडें उनके शुरुआती जीवन में देखी जा सकती हैं क्योंकि उनकी स्कूली पढ़ाई पहले कृष्णनवजयण मठ और बाद में आचार्य पाठशाला पब्लिक स्कूल में जहां भारतीय दर्शन,अध्यात्म और वेद पढ़ाए गए। पिछले दिनों रजनी ने दुबई में मुसलमानों के साथ अपने खास रिश्ते का जिक्र कुछ खुलकर किया उन्होंने कहा ""जब मैं 70 के दशक में बस कंडक्टर था, तो ट्रांसपोर्ट में काम करने वाले ज्यादातर लोग मुस्लिम थे। जब मैं चेन्नई आया तो एक दोस्त के घर किरायेदार के तौर पर रहा। उस बिल्डिंग का मालिक एक मुस्लिम दोस्त था”। उन्होंने बताया, ”जब मैं मशहूर हुआ तो पियोस गार्डन में खुद का घर खरीदा, वह भी मुस्लिम समुदाय के एक शख्स का था”। उन्होंने कहा, ”यहां तक कि पहले राघवेंद्र मंडपम का मालिक भी मुस्लिम ही था”। मैंने कई फिल्मों में काम किया है, लेकिन आज भी अगर कोई फिल्म उन्हें झटका दे सकती है, वह है बाशा”।




ऐसे में बीजेपी की राजनीतिक लाइन लेंथ के साथ वो कितना सहज महसूस करेंगे,वो तो आने वाला वक्त ही बताएगा। कुछ लोगों की मानें तो उनकी राजनीति में एंट्री ही लंबा असर नहीं डाल पाएगी या तो वो चिरंजीवी की प्रजाराज्यम की तरह सिमट जाएगी या फिर विजयकांत की डीएमडीके जैसा कुछ करेगी,जिसने तमिलनाडु की रीजनल पार्टियों का खेल बिगाडा था । रजनी की राजनीति की क्या दिशा और दशा होगी,ये वो ही जानते हैं,लेकिन अभी तलक तो उन्होंने अपने पुराने अंदाज़ की ही तरह सब तरह की अटकलों के लिए मंच खाली छोड़ दिया है।

 

 

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ajeet
very nice