Thursday, December 13, 2018
दशहरा:तथ्य कैसे कैसे?
रघोत्तम शुक्ल
लेखक-कवि एवं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी

आश्विन अर्थात् क्वॉर मास के शुक्ल पक्ष की दशमी देश में एक बहुत बड़े पर्व के रूप में मनाई जाती है,जिसे विजया दशमी या दशहरा कहते हैं। लोक मान्यतानुसार इस तिथि को श्रीराम द्वारा लंकापति रावण का वध किया गया था,जिसने उनकी पत्नी सीता जी का हरण कर अपने उद्यान अशोक वाटिका में रक्खा था।आइये देखें, प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार इस तिथि और रावण वध के बीच क्या सह-सम्बन्ध है?


                                               आदि कवि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण श्रीराम की समकालीन रचना मान्य है। उसके अनुसार सीता जी की खोज करने वाले वानर यूथों की सभी दिशावों में विदाई आश्विन मास के अंत मे हुई थी,और सभी को एक मास का समय वापसी के लिये दिया गया था।दक्षिण दिशा की ओर भेजे गये दल के साथ अंगद,हनुमान,जामवन्त भी थे तथा हनुमान जी को श्रीराम ने पहचान के लिये अपनी अॅगूठी भी दी थी।उत्तर,पूर्व और पश्चिम की दिशावों की ओर गये खोजी वानर यूथ निर्धारित अवधि में निराश लौट आये थे;किन्तु दक्षिण की ओर गये वानर डटे रहे। उन्हें  इतना समय लग गया कि शिशिर ऋतु का अंत और बसन्त ऋतु की आहट होने लगी(किष्किंधा काण्ड/53/04)।यानी फाल्गुन का उत्तरार्द्ध आ गया।इस बीच उन्हें सम्पाति गृद्ध मिले और सीता जी का पता बताया।



फिर समुद्र लंघन,सीताखोज,लंकादहन,सेतुबन्ध आदि की घटनाएं हुईं।अतः युद्धारम्भ चैत्र में ही हो पाया होगा!युद्ध 6/7 महीने चलने का सवाल ही नहीं है।हॉ।प्रयाण"विजय"मुहूर्त"में किया,जो प्रतिदिन 11.48 से 12.12 तक होता है,जिसे "अभिजित"भी कहते हैं।यह विजय/सफलता सुनिश्चित करता है।उस समय चन्द्रमा उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र पर थे।


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           हनुमन्नाटक,देवी भागवत और कृत्तिवास रामायण के अनुसार राम ने आश्विन शुक्ल10 को लंका की ओर आक्रमण के लिये प्रस्थान किया।
        

   अथ विजयदशम्यामश्विने शुक्ल पक्षे,
 
   दशमुखनिधनाय प्रस्थितो रामचन्द्रः।
 
                                    (हनुमन्नाटक 7/2)


             देवी भागवत के अनुसार नारद मुनि ने श्रीराम को शारदीय नवरात्र व्रत रखने का परामर्श दिया,जिसका उन्होंने पालन किया।नौ दिन व्रत रखकर,दसवें दिन पारण एवं दान कर देवी विजया को प्रसन्न कर विजय हेतु प्रयाण किया:--

               समाप्य तद्व्रतं चक्रं प्रयाण दशमी दिने।

               विजया पूजनं कृत्वा दत्वा दानम्यनेकशः।।




     कृत्तिवास रामायण कहती है:---

                दशमी ते पूजा करि विसर्जया महेश्वरी,संग्रामे चलिल रघुपति। (लंकाकाण्ड)

 स्कन्द पुराण/ब्राह्म खण्ड के अनुसार यह युद्ध 87 दिन चला,जिसमें अलग अलग कारणों से,अंतर दे देकर 15 दिन युद्ध विराम रहा।ठोस युद्ध 72 दिन हुवा। क्वॉर की शुक्ल पक्ष दशमी को राम शिव लिंगार्चन करके पर्वत कंदरा से बाहर आये।सुग्रीव के सहयोग से एक मास सैन्य उद्योग किया।अगहन कृष्ण अष्टमी को सेना लंका की ओर चली।7 दिन में समुद्र तट पर पहुंच कर विविध तैयारियॉ की गईं।सेतु निर्माण में चार दिन लगे।पौष शुक्ल चतुर्दशी को राम का शिविर सुबेल पर्वत पर लग गया। रावण वध चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को और अंत्येष्टि अगले दिन अमावस्या को हुई।प्रतिपदा को राम रणभूमि में ही रहे।अगले दिन विभीषण का राज्याभिषेक हुवा।


               राम की अयोध्या वापसी और राज्याभिषेक बैशाख शुक्ल सप्तमी को सम्पन्न हुवा। कुल मिलाकर रावण वध आश्विन शुक्ल दशमी को नहीं हुवा।अधिकतम यह विजय प्रयाण दिवस कहा जा सकता है।

 

 

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