Monday, August 26, 2019
शहादत पर जागती क्षणिक देशभक्ति !!


टीवी पर जब देखता हूँ कि पूरे देश का खून सैनिक की शहादत पर उबल रहा है,सबकी देशभिक्त चरम पर है,सब को देश के सैनिकों की चिंता है,सब सैनिकों के सम्मान में मोमबत्ती, मार्च और पुतला फूंकने में लगे हैं,फेसबुक और व्हाट्स एप्प पर हर कोई सैनिकों के सम्मान में एक से बढ़कर एक संदेश पोस्ट कर रहे हैं तब शहीदों का इतना भारी सम्मान देखकर मुझे अपने सैनिक होने पर बड़ा गर्व महसूस होता है,मैं अभिभूत हो जाता हूँ। एक दिन फेसबुक पर देखा कि मेरे गृहनगर में भी मोमबत्ती मार्च निकाला गया, लोगों ने शहीदों के प्रति चिंता जतायी, सेल्फी ली,वीडियो बनाये और रोष भरे बयान भी दिए, फिर सब फेसबुक और व्हाट्स एप्प में डाल दिया। मैं अपने गृहनगर के इन्हीं लोगों के बीच में पला बढ़ा और इस देश रक्षा की नौकरी में अधिकारी बनकर आया। आज कई साल हो गए मुझे कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत में अंतरराष्ट्रीय सीमा की रक्षा और आतंकवाद विरोधी अभियान में कार्य करते हुए, नक्सल विरोधी अभियान से लेकर चुनावों में सुरक्षा प्रदान करते हुए, मैंने भी कई बार मौत को बहुत नजदीक से देखा है,बस मैं अभी तक शहीद नहीं हुआ ।
अनिला आर. विशाल ,लेखिका 


मेरे गृहनगर के लोग,मेरे बचपन के दोस्त और मेरे पड़ोसी भी धीरे-धीरे मुझे भूलते जा रहे हैं पर मैं उन्हें नहीं भूला। मैंने अभी तक अपना गृहनगर नहीं छोड़ा,हर छुट्टियों में वहीं रहने जाता हूँ पर इन देश प्रेमी मोमबत्ती जलाने वालों में से कोई मुझसे कभी भी मिलने नहीं आता। हालांकि मैं गृहनगर में घर पहुचंकर सबसे पहले अपने फेसबुक पर भी डाल देता हूँ कि मैं घर आया हुआ हूँ ताकि सबको पता चल जाए और शायद कोई मिलने आ जाए पर कुछ लोग फेसबुक पर पूछते तो हैं कि कब तक हो मगर आते कभी नहीं। बाजार में निकलता हूँ जाने पहचाने लोगों से आमना- सामना होता है तो हमेशा वो बस दो सवाल ही पूछते है ’‘और कब आए ?’’ ‘‘और आजकल कहाँ हो‘‘। बस इतने पर ही उनका सारा सैनिक प्रेम और देशभिक्त खत्म हो जाती है। बाकी उन्हें कोई मतलब नहीं कि मैं कैसे हूँ,कैसा हूं । घर में सब कैसे हैं,माँ कैसी है,परिवार कैसा है !!! शायद सब व्यस्त हैं अपने जीवन में और वैसे भी मैं तो अभी जिन्दा हूँ, शहीद थोड़े ही हुआ हुँ जो वो घर आएंगे।




मेरे पिताजी ने बड़ी ईमानदारी से कमाए पैसों से गृहनगर की एक पूणर्तया अनुमोदित सहकारी आवासीय कॉलोनी में एक घर बनाया,पूरे पैसे दिए,रजिस्ट्री कराई, नक्शा पास कराया। सब कुछ वैध किया मगर फिर भी आज तक उस घर तक पक्की सड़क नहीं है,कच्ची है जो बरसात में डूब जाती है, मगर इन मोमबत्ती जलाने वालों को कभी फिक्र नहीं हुई कि इस सैनिक के घर के रास्ते की सड़क ही बनवा दें,नगरपालिका के पानी की पाइप लाइन ही बिछवा दे। फिक्र शायद इसलिए नहीं हुई क्योंकि अभी मैं जिंदा हूँ,अभी शहीद नहीं हुआ हूँ। आप जाइये कभी मेरी कॉलोनी में आपको न सड़क मिलेगी और न नाली । लगभग 2 वर्ष पहले तक मेरे खुद के घर का पानी एक पड़ोस के प्लाट में जाता था जो मेरे ही एक बचपन के मित्र ने खरीद लिया और उसमें मिट्टी भरवा दी,अब नाली न होने की वजह से पानी कहीं भी जाना बन्द हो गया, मेरे घर के बाहर पानी भर गया। माँ परशेान, मुझे बार-बार फोन करे, मैं अपने दोस्तों को फोन करूँ,मगर किसी को फुर्सत नहीं,सब व्यस्त हैं। सबकी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं हैं। मैने नगर के हर संभ्रांत नागिरक,पालिका सदस्य,पालिकाध्यक्ष हर किसी से निवेदन किया मगर सबकी अपनी राजनीति, किसी को फिक्र नहीं क्योंकि मैं तो जिंदा था, शहीद नहीं हुआ था। कल वो सब लोग भी शहीदों के लिए अपने प्रेम और चिंता को व्यक्त कर रहे थे और मोमबत्ती जला रहे थे। हालांकि किसी शुभचिंतक के सहयोग से तत्कालीन जिलाधिकारी ने इसमें मेरी मदद की,मगर ये मोमबत्ती वाले नहीं आए।

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मेरी माँ घर पर ही रहती है पर ये सैनिकों के प्रति चिंता करने वाले लोगों को कभी मेरी उस माँ की चिंता नही हुई,क्योंकि उन्हें सिर्फ भारत माता की फिक्र है भारत माता की रक्षा करने वालों कि माँ की नहीं। कल मेरे मुहल्ले के भी कई लोग देशप्रेम की मोमबित्तयां जला रहे थे,मगर देश की सीमा पर तैनात सैनिक की माँ की खैर खबर लेने उनमे से कभी कोई घर नही आता। शायद व्यस्त है वो सब अपने में और मैं भी तो अभी जीवित हूँ,अभी मैं शहीद नहीं हुआ हूँ। मैं फेसबुक पर अपने गृहनगर में होने वाली गतिविधियों को देखता रहता हूँ, तरह तरह के आयोजन होते रहते हैं। मुख्य अतिथि के साथ फोटो खिंचवाने की होड़ सी लगी होती है और फिर इन्हें फेसबुक पर डालकर अपने रसूख को साबित करने की प्रतिस्पर्धा पर सभी आयोजनों में एक बात कॉमन होती है कि मुख्य अतिथि या तो कोई पुलिस अधिकारी है या फिर प्रशासनिक अधिकारी या फिर विधायक जी। बचपन से अभी तक मैंने किसी कायर्क्रम में सैनिक को मुख्य अतिथि नहीं देखा। हालांकि मेरे गृहनगर के आसपास सैन्य बलों में कायर्रत सैनिकों की कोई कमी नहीं,जो छुट्टी पर आते रहते हैं। इन लोगों ने कभी शायद जानने की कोशिश ही नही की कि कौन कौन सैन्य बलों में काम करते हैं और इनमें से कुछ वीरता के मेडल भी पाए हुए है। पर ये सब तो अभी जिंदा हैं, शहीद नही हुए हैं, फिर कैसा सम्मान। सैनिक तो सिर्फ मरने पर ही सम्मान का अधिकारी है न ।

इस लेख के सह प्रायोजक हैं - डिवाइन लिविंग हॉलीडे होम स्टे



मैं अक्सर फेसबुक पर अपने गृहनगर और उसके आसपास के विद्यालयों में आयोजित कायर्क्रमों को देखता हूँ कि कोई भी सैनिक शहीद होता है तो वहाँ भी मोमबित्तयां जलती है,सैनिकों के सम्मान में नारे लगते हैं,छात्र स्लोगन लिखी तख्तियां लेकर फोटो खिंचवाते है, अखबार में खबर छपती है,मगर जब भी उन विद्यालयों में कोई अन्य विशेष कायर्क्रम होता है तो मुख्य अतिथि के तौर पर वही पुलिस अधिकारी और प्रशाशिनक अधिकारी आमंत्रित होता है,कोई सैन्य बलों वाला नहीं। मैंने एक बार किसी से पूछा कि ये स्कूल मालिक लोग तो संभ्रांत लोग है फिर ये क्यों पुलिस वालों को बुलाते हैं ,पुलिसवालों से शिक्षा वालों का क्या काम,तो उसने मुझे समझाया कि पुलिस अधिकारियों से संबंध होने से समाज में रसूख बढ़ता है। मुझे लगा शायद वो सही भी है, सैनिकों को बुलाने से तो रसूख नहीं बनेगा। हाँ अगर सैनिक शहीद हो जाये तो उसके लिए नारे लगाने,मोमबत्ती जलाने और प्रेस को वक्तव्य देने से रसूख जरूर बनता है।

शुरू-शरू में जब मैं भी सैनिक बना तो मुझे लगा कि शायद सरकारी दफ्तरों में हमारा लिहाज तो होगा ही, मगर धीरे-धीरे समझ में आया कि ’’बाबूजी‘‘ को किसी का लिहाज नही बस उन्हें तो ’’वो‘‘ चाहिए। अब नैतिकता के नाते मुझे स्वयं तो ‘‘वो’’ देने में शर्म आती है इसलिए कुछ शुभचिंतकों के माध्यम से ‘‘वो’’ देकर काम करवाना पड़ता है,जबकि काम वैध है । बंदूक के लाइसेंस के रिन्यूल से लेकर गाड़ी ट्रांसफर तक हर काम मे ‘‘वो’’ देना पड़ता है,जबकि काम के
कागजों में सैन्य वर्दी में फोटो भी लगा है। कल वो सब‘‘बाबूजी’’भी शहीदों के लिए मोमबत्ती जलाकर सैनिकों के लिए चिंतित थे । मगर जो जिन्दा सैनिक है उनकी उन्हें चिंता नही है। सम्मान तो मरने पर ही मिलेगा न।




अक्सर मेरे अधीन कायर्रत सैनिक मेरे पास सरकारी कायार्लयों में काम न होने,तहसील थानों में सुनवाई न होने की समस्याएं लेकर आते है मैं उन विभागों को पत्र लिखता हूँ,संबंधित अधिकारियों को फोन करता हूँ,तब बड़ी मुश्किल से कोई कोई समस्या हल हो पाती है । पर ये शहीदों के लिए लगते नारे जलती मोमबित्तयां देखकर मुझे लगता है कि ये सम्मान और चिंता तब क्यों नही जगती जब सैनिक खुद जिन्दा है। मैंने तो जिंदगी और मौत को बहुत नजदीक से देखा है,मैंने अपने शहीद साथियों के ताबूतों को कंधा दिया है, मैंने शहीदो के घरों से आने वाली चिठ्ठियों को पढ़ा है जो वो बाद में होने वाली समस्याओं के बारे में लिखते हैं तब न कोई मोमबत्ती वाला उनके घर मदद करने आता है और न कोई फेसबुक पर देशभक्ति दिखाने वाला।खैर मैं फिर भी अनुग्रिहत हूँ इन सब लोगों का, जिन्दा न सही मरने पर तो भारी सम्मान देते हैं। देश रक्षा तो मेरा कर्म है धर्म है वो सम्मान का भूखा नहीं बल्कि शत्रु के खून का प्यासा है ।


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