Monday, August 26, 2019
अक्षयपात्र
अभिषेक शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

हैदराबाद : विश्व भर के वैज्ञानिकों की चिंता रही है कि कहीं आधुनिक खेती करते करते पुरानी प्रजाति नष्ट न हो जाएं। कहीं महाप्रलय आये या कोई महाद्वीप नष्ट हो जाये तो ऐसी स्थिति में भी अनाज के भंडार या उनको उपजाने के लिए जर्म प्लाज्मा खत्म नही होंगे। इसकी सोच दशकों पहले ही विश्व भर के वैज्ञानिकों ने साकार कर ली थी। विश्व भर के पचास से अधिक देश आपज मे कृषि सहयोग से जर्मप्लाज्म बैंक स्थापित कर चुके हैं जहां एक ही अनाज के सैकड़ों नही बल्कि हजारों प्रजातियों के जर्मप्लाज्म इकट्ठा करके उनको -20 डिग्री पर सुरक्षित रखा गया है। यह बैंक दशक नही बल्कि सदियों से आगे की संकल्पना को आकार दे रहे हैं। खुशी की बात यह भी है कि भारत मे भी संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग से हैदराबाद में इकरिसैट (internation crop research institute in semi arid tropic) जैसी संस्था में वैज्ञानिक भविष्य के बीजों या जर्मप्लाज्म को जिंदा रखने के लिए जी जान से जुटे हुए हैं। यहां विश्व स्तर के शोध सिर्फ कृषि और कृषि उत्पादों को प्रयोग में सरल बनाने और अपनाने के लिए ही नही बल्कि किसानों को जागरूक करने के लिए भी प्रयास हो रहा है। यहां शोध के नतीजों से किसानों ने खुद को समृद्ध बनाने की कुंजी भी हासिल की है।

मोटे अनाज पर यहां अधिक काम हुआ है क्योंकि इससे अधिक ऊर्जा शरीर को मिलती है और यह सस्ते भी हैं। उपजाने में आसान और प्रोटीन युक्त भी। जिसमें ज्वार, बाजरा, रागी, चना, मंडुवा जैसे अनाज शामिल हैं। साथ ही इनसे बनने वाले उत्पादों पर भी शोध जारी हैं ताकि प्राकृतिक तरीके से बनने वाले हाइजीनिक उत्पाद मानव के स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाएं। 





इस वैश्विक संस्था के प्रयासों से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी खासे प्रभावित हुए हैं। उनके द्वारा सन 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की मंशा को वैश्विक कृषि संस्था इकरीसैट (इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फ़ॉर सेमी एरिड ट्रॉपिक्स) अमली जामा माह भर से पहनाने में लगा हुआ है। सरकार की मंशा सबसे पहले विदर्भ और उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड के किसानों को सक्षम बनाना है ताकि वहां के किसान कर्जों से तो मुक्त हों ही साथ ही विकास को भी गति दी जा सके।


योजना का वैश्विक सहयोगी

हैदराबाद के पाटनचेरु स्थित इकरीसैट संस्था भारत सहित विश्व के 50 से अधिक देशों का संगठन है। जो विश्व स्तर पर बीज बैंक संरक्षण, आधुनिक कृषि परियोजना, जीन और ऊतक संवर्धन के अतिरिक्त कृषि उत्पादों के विपणन में भी सक्रिय रहता है। यहां से ट्रांसजेनिक पौधों से बीज प्राप्त कर रोग रहित बीजो को सरकार को उपलब्ध कराती है। साथ ही किसानों को प्रशिक्षण और कृषि उत्पादों से खाद्य सामग्री की भी तकनीकि प्रदान करती है।


क्या है किसान कल्याण का लक्ष्य

बुंदेलखंड के सात क्षेत्रों में किसानों की कृषि योग्य भूमि में से हर जगह 5000 हेक्टेयर जमीन का पहले चरण में चयन किया गया है। वर्ष में खेती से दो फसलों सहित मिश्रित खेती की प्रविधि अपनाने के साथ पशुपालन और मत्स्यपालन को बढ़ावा दिया जाएगा। जिससे कृषि पर आधारित आय में बढोत्तरी होगी। अगले चरण में खाद्य परिरक्षण और डिब्बाबंदी के जरिये उनको उद्यमी भी बनाया जाएगा। यह सभी उत्पाद लघु उद्योग मंत्रालय के सहयोग से विश्व भर में ऑनलाइन पोर्टल के जरिये बिक्री के लिए उपलब्ध होंगे। इस पूरी योजना के सिर्फ कृषि के ही लिए कई चरणों मे पानी की उपलब्धता, मृदा स्वास्थ्य, फसल सुरक्षा, फसल स्वास्थ्य, फ़ूड प्रोसेसिंग, कोल्ड एवं वेयरहाउस संग उत्पाद को प्लेटफॉर्म देने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। 



यह वैश्विक संस्था सरकार की मंशा के अनुरूप उत्तरप्रदेश में लखनऊ और झांसी में किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए बैठक हो चुकी है। अगले चरणों को जमीन पर उतार कर किसानों को कई माध्यमो से सबल बनाने की तैयारी है। योजना फिलहाल पांच सालों की है जो अभी प्राथमिक चरणों मे ही है।
- डॉ सुहास पी. वानी, रिसर्च प्रोग्राम डायरेक्टर एशिया, इकरीसैट, हैदराबाद


नजीर होगी देश के लिए

यह योजना ठीक स्मार्ट सिटी के ही तर्ज पर काम करेगी। पहले चरण में पांच सालों के लिए विदर्भ और बुंदेलखंड का चयन हुआ है मगर पूरी संभावना है अगले चरण में देश के भी कुछ अन्य क्षेत्र चुने जाएं। मगर सरकार की मंशा है कि चयनित इलाकों के नतीजे अन्य क्षेत्रों के लिए बतौर नजीर पेश किया जाय ताकि किसान प्रेरित हों। वहीं सरकारी मंशा दोगुनी करने की भले हो मगर अधिकारी मानते हैं कि योजना सफल हुई तो लगभग 50000 रुपये वार्षिक कमाने वाला किसान डेढ़ लाख वार्षिक तक आय कर सजेगा।



 

 

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