Monday, August 26, 2019
क्या कहता है शिव का मतवाला रूप
रघोत्तम शुक्ल
लेखक,कवि एवं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी


परिवेश फागुनी बहार फागुनी बयार और वासंती सुगंध से सुवासित है । धरा और आकाश मांगलिक लक्षणों से युक्त हो रहे हैं । शंख और घंटों की ध्वनि गूंज रही है । लोग मंदिरों एवं मठों की ओर जा रहे हैं ।पवित्र नदियों के तटों पर स्नान की धूम है तो कहीं पूजा पाठ और हर हर बम बम के साथ कोई बेलपत्र धतूरे और मदार लिए पार्वती भर्तार को भेंट करने जा रहा है तो कहीं है रात्रि जागरण और शिव संकीर्तन का मनहर आयोजन । यह कैसी पावन बेला है । कौन सा है यह पवित्र पर्व ? किस महतो महीयान की उपासना,अर्चना अराधना का विशेष मुहूर्त है यह महाशिवरात्रि । भगवान शिव के भक्तों द्वारा श्रद्धान्वित अर्पण में कनक(धतूरा) तथा अर्क (मदार या अकौड़ा) का बहुधा उल्लेख है ।


पद्माकर कवि कहते हैं “देखो त्रिपुरारी की उदारता अपार जहां पैठे फल चारि फूल एक दै धतूरे को” । गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है “धाम धतूरो विभूषित को करो निवासु जहां सब लै मरे दाहै । शंकराचार्य जी ने उनकी स्तुति करते हुए “मंदार पुष्प बहु सुपूजिताय” लिखा है । उनके आभूषण नाग हैं । वे चिता की भस्म लपेटे रहते हैं । तो क्या वे पागल या विवेकहीन हैं । वास्तव में वे वस्तुएं हैं जिन्हें अन्य लोग त्याज्य मानते हैं । सुंदर वस्त्राभूषण,सुगन्धित पुष्प और सुस्वाद भोग्य पदार्थ तो सभी को श्लाघ्य हैं । एक भोले शंकर ही ऐसे हैं जो बीतराग,दग्धकाम हैं और उपेक्षित वस्तुओं को अंगीकार करते हैं। अपशकुन करने वाली चीजों का आलिंगन करते हैं। धतूरा आदि उनके नशे के पदार्थ नहीं उनके दीनों, उपेक्षितों के प्रति प्रेम तथा उदारता,विशाल हृदयता के परिचायक हैं । अमृत तो सभी चाहते हैं, विशपायी भगवान शंकर ही हैं, उन्हें शत शत प्रणाम।
                                                                                                                                             

                  

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आचरण और विचरण

कभी दिगंबर, कपालधारी, श्मशान विचरण करते हैं तो कभी पर्वत पर विराजमान हैं। कभी अति प्रसन्न हो अकिंचन अकर्मशील को सब कुछ दे देते हैं तो कभी क्रुद्ध हो काम को भी भस्म कर देते हैं। मतवाले विक्षिप्त की भांति आचरण करते परिलक्षित होते हैं । वे दरअसल योगेश्वर हैं । योग मार्ग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि नामक 8 अंग होते हैं। अंत में चित् शक्ति कुंडलिनी जागृत होती है ।



ऐसे योगी को नाना प्रकार की विभूतियां जागृत होती हैं । महर्षि पतंजलि ने ‘योग दर्शन’ के विभूति पाद में अनेक विभूतियों का उल्लेख किया है । शिव का शरीर में विभूति लपेटना इसी बात का संकेत है कि विभूतियां उन्हें अति निकट से घेरे हैं किंतु वे आंख बंद किए निर्लिप्त, उनसे दूर हैं। कुंडलिनी जागृत होने पर अपारशक्ति प्रस्फुटित होती है। योगी के ‘कुंडलिनी: द सीक्रेट ऑफ लाइफ’ नामक पुस्तक में लिखा है कि कुंडलिनी जागृत होने पर जब शक्तिपात होता है तो योगी विचित्र बातें करता है। वह कभी हंसता है ,कभी चिल्लाता है, कभी दुखी होता है, कभी पागल जैसा लगने लगता है। भगवान शिव तो कोई साधारण योगी या सामान्य शक्तिपात वाले व्यक्ति नहीं है । शक्तिपति हैं शक्तिधर हैं ।

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श्री शंकराचार्य ने ‘विवेक चूड़ामणि’ में ब्रह्मवेत्ता को निरंकुश विचरण करने वाला कहा है । वह वस्त्र से युक्त या वस्त्रहीन मृगचर्मधारी उन्मत्त के समान अथवा पिशाचवत स्वेच्छानुसार विचरण करता है । इस प्रकार के मद में चूर रहते हैं शशांकशीश। ऐसे पागल और मतवाले हैं शाम्भवी पति। मदमत्त नहीं महायोगी है शिव । चराचर में व्याप्त परात्पर ब्रह्म हैं वे । अनादि , अनंत, अविनाशी हैं शूलपानी।चाहे वे भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों के रूप में विराजमान रामेश्वर, सोमनाथ, केदारेश, काशीपति विश्वनाथ या महाकालेश्वर हो अथवा इस्लाम धर्मावलंबियों द्वारा पूज्य और परिक्रमित मक्का में आसीन ‘संगे असवद’ रूप मक्केश्वर शिव ,मिस्र वासियों द्वारा अर्चित ‘एटम’ हों या यहूदियों के बहुचर्चित ‘बेलफेगोर’ । शंकराचार्य,पुष्पदत और रावण की लेखनी से स्तुत हों या कर्नल टॉड की खोजी मस्तिष्क का विलास । सर्वत्र पूज्य हैं भगवान शंकर।


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