Monday, August 26, 2019
राखी भेजी , राख मिली
आशुतोष शुक्ला
वरिष्ठ पत्रकार

ऱक्षाबंधन के त्यौहार के साथ एक किवदंती सबसे ज्यादा प्रचलित है । वो है मुगल शासक हुमायूं को मेवाड़ की रानी कर्णावती की ओर से राखी भेजा जाना और हुमायूं द्वारा मदद की भरसक कोशिश करना ।  न जाने कब से ये किस्सा चला आ रहा है और खूब कहा सुना जाता है । किस्सा कहने सुनने वालों ने ये कभी जानने की कोशिश नहीं की कि अगर हुमायूं ने कर्णावती को अपनी बहन मान ही लिया था तो उसे जंग में हारने के बाद अपमान से बचने के लिए जौहर क्यों करना पड़ा ? आइये आज इस किस्से के ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल की जाए ।  


साल 1531 , 1532 ईस्वी. तक गुजरात का शासक बहादुर शाह मालवा और रायसेन जीत चुका था । इसके बाद 1533 ईस्वी में उसने चित्तौड़ के सिसोदिया शासक को भी हरा दिया था ।मजबूत राजनैतिक स्थिति में आ चुका बहादुर शाह अब बिना किसी भय के हुमायूं के अफगान दुश्मनों को बतौर शरणार्थी अपने राज्य में पनाह दे रहा था। साल 1534 ईस्वी के अंत में गुजरात का शासक बहादुरशाह चित्तौड़ की घेराबंदी में लगा था ।


उसी वक्त मेवाड़ की रानी कर्णावती ने मुगल सम्राट हुमायूं से मदद मांगी कि बहादुरशाह से उसकी रक्षा की जाए । ऐसा करना तथ्यपरक और तार्किक इसलिए लगता है क्योंकि रानी सैन्य शक्ति में बहादुरशाह के मुकाबले कमजोर थी और बहादुरशाह पहले से ही हुमायूं का दुश्मन था । कहा जाता है कि ये संदेश रानी की ओर से राखी के धागों के साथ भेजा गया था ।ये स्पष्ट संदेश था कि रानी ने हुमायूं को अपना भाई मान लिया है और अब सम्राट हुमायूं का ये कर्तव्य़ है कि वे अपनी राखी बहन कर्णावती की रक्षा करें ।


हुमायूं ने राखी स्वीकार कर ली । क्षणिक भावुकता और हिंदू परंपराओं का कुछ मान रखते हुए वह चित्तौड़ की ओर रवाना तो हुआ लेकिन जल्द ही एक मुस्लिम हुक्मरान के दिल पर दिमाग भारी पड़ गया ।इस्लामिक धार्मिक सीखों और परंपराओं और सियासत के आगे राखी के धागे बेमतलब के लगने लगे । जिस देश पर हुमायूं हुकूमत करने की जद्दोजहद कर रहा था उसी देश की परंपराओं को उसके शातिर दिमाग ने जल्द ही रौंद डाला। उसे न कर्णावती के मान का ख्याल रहा न भारतीय परंपराओं का । हैरानी की बात तो ये है कि इस मौके पर वो एक अच्छा राजनीतिक फैसला भी न ले सका और उसके फैसले पर इस्लामिक धार्मिक मान्यताएं भारी पड़ीं । उसने सोचा कि ये कुफ्र होगा अगर वह मुस्लिम शासक बहादुर शाह पर हमला उस वक्त करे जबकि वह एक गैर मुस्लिम यानि राजपूत यानि काफिर के साथ जंग कर रहा है । यही वो मौका था जब हुमायूं एक सियासत दां के तौर पर मात खा गया । राजपूतों का भरोसा जीतने ,उनकी दोस्ती और वफादारी पाने का ये शानदार मौका था ।

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ये अपने दुश्मन बहादुरशाह को भी मात देने का सुनहरा अवसर था लेकिन उसने दोनो मौके एक साथ खो दिये । हुमायूं ने धार्मिक भावनाओं की रौ में फैसला लिया और वैसे वह खुद भी तो भारत में काफिरों के खिलाफ जिहाद के नाम पर ही जंगें लड़ रहा था ।हुमायूं अपने इसी फैसले के साथ रहा और चित्तौड़ पहुंचने की बजाय ग्वालियर के किले में ही रुक कर चित्तौड़ के घटनाक्रम पर करीब से नजर बनाए रखीं । हुमायूं करीब एक महीने तक ग्वालियर के किले में ही रुका रहा । मार्च 1535 में आखिर चित्तौड़ की हार हुई,बहादुरशाह को जीत मिली । महारानी कर्णावती ने जौहर कर लिया ।


हैरानी की बात तो ये है कि राखी का ये किस्सा आखिर पैदा कहां से हो गया और इतना प्रसिद्ध कैसे हो गया । जबकि किसी समकालीन मुस्लिम या राजपूत इतिहासकार ने इस बात का जिक्र तक नहीं किया है । किस्सा सुनने सुनाने वाले कभी इसके पीछे छिपे तथ्यों की पड़ताल क्यों नही करते ? सभी सुधी पाठकों से अपील है कि वे किसी मनगढ़ंत कहानी पर ऐतबार करने से पहले खुद ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल करें । ये कहानी पूरी तरह से बेबुनियाद है ।   

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