Tuesday, October 16, 2018
भगवान श्री कृष्ण की ससुराल
सुरेश मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार,औरेया

जन्माष्टमी में सबसे ज्यादा धूमधाम हमें मथुरा में दिखाई देती है लेकिन उनके कम ही भक्त ये जानते होंगे नंदलाल की ससुराल कहां है और उनके अवतरण का त्योहार यहां भी खूब हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है । सुख सागर महापुराण के 10 वें खंड के 53 वें अध्याय में कृष्ण की ससुराल के रूप में कुंडलपुर का वर्णन किया गया है । दरअसल यही कुंडलपुर वर्तमान में उत्तर प्रदेश के औरेया के बिधूना तहसील के कुदरकोट के नाम से प्रसिद्ध है । भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर कालीन राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी का इसी कुदरकोट से हरण कर अपना विवाह रचाया था । महापुराणों के तथ्यों के अनुसार राजा भीष्मक की राजधानी कुंडलपुर में थी जो वर्तमान का कुदरकोट है । देवी रुक्मिणी के पिता भीष्मक का किला अब खंडहर का रूप ले चुका है ।

                                       भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन  हो या फिर माखनचोर से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण पर्व सांवले सलोने के ससुरालीजनों का उत्साह किसी भी ऐसे पर्व पर कम नजर नहीं आता । वास्तव में औरेया में ऐसे कई स्थल हैं जो ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि पौराणिक भी हैं । चर्चा चाहे इंद्र के एरावत हाथी की हो या फिर दुर्वासा ऋषि की । द्वापर के पांडव हों या फिर तक्षक का यज्ञ स्थल । यह सभी पौराणिक विरासतें औरैया की धरती की विशेषता रही हैं । इन सभी में जो विशेष है वह है आज का कुदरकोट जहां भगवान श्रीकृष्ण के ससुरालीजन उनका जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाते हैं ।
                                                                       पुरहा नदी के तट पर बसे कुदरकोट के राजा भीष्मक के 5 पुत्र थे और पुत्री के रूप में देवी लक्ष्मी स्वरूप रुक्मिणी थीं । पुराणों में लिखी बातों का प्रमाण मिलना आसान नहीं है लेकिन राजा भीष्मक की राजधानी की दिशा,स्थान और स्थलों का मिलान करने पर द्वापर के कुंडलपुर की स्थिति अब के कुदरकोट से ही मेल खाती है । 
संबंधित लिंक भी देखें - http://www.indiamapia.com/Auraiya/kudarkot.html                                                                                                                        
                                                                                                                                                                                 किवदंतियों के मुताबिक महल के बाहर स्थित मंदिर में पूजा पाठ करना राजा भीष्मक की पुत्री देवी रुक्मिणीं की दिनचर्या में शामिल था । माता गौरी से देवी रुक्मिणीं ने श्रीकृष्ण के रूप में अपना पति मांगा था जिसे मां गौरी ने पूरा किया । श्रीकृष्ण द्वारा देवी रुक्मिणीं का मंदिर से पूजा कर लौटते समय हरण करने के साथ ही उनकी इच्छा पूरी हुई और इसी के साथ देवी गौरी भी मंदिर से अलोप हो गईं । तभी से यह मंदिर अलोपा देवी के नाम से प्रसिद्ध हो गया ।

 
                            अलोपा देवी मंदिर से महज थोडी ही दूरी पर राजा भीष्मक का महल था । फिलहाल ये अब खंडहर अवस्था में है । इसके आस-पास खुदाई करने पर हर जगह विखंडित मूर्तियां ही मिलती हैं । कहा यह भी जाता है कि अपने अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने कुछ वक्त कुदरकोट में भी बिताया था और यहां से जाने के समय उन्होंने शिवलिंग की स्थापना भी की थी ।                 

अन्य संबंधित लिंक - http://en.wikipedia.org/wiki/Kudarkot                                                           

                                                                   
                                          कुदरकोट के महल स्थल से उत्तर की ओर कन्नौज तो पश्चिम की ओर मथुरा स्थित है । लोक परंपरा के अनुसार कुदरकोट व उसके आसपास शिव के उपासक राजा भीष्मक व उनकी राजकुमारी रुक्मिणीं द्वारा पूजित कई शिवलिंग यहां आज भी स्थापित हैं । यहां का पौराणिक इतिहास समृद्ध है फिर भी दुर्भाग्वश कुदरकोट को अपना वो सम्मान नहीं मिल पाया है जिसका वो असली हकदार है ।

























 

   Comments
Priti tripathi
Jai Shri Krishna.