Tuesday, August 21, 2018
चंपावत का पाषाण युद्ध
भक्त दर्शन पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार, पिथौरागढ़

उत्तराखंड का चंपावत जनपद अपने पत्थर युद्ध के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। रक्षा बंधन के दिन मनाया जाने वाला यह ऐसा उत्सव है जिसमें लोग एक दूसरे पर पत्थर मारकर खून बहाते हैं। युद्ध में शामिल होने वालों को रण बांकुरा कहा जाता है। परमाणु युग में यह परंपरा भले ही विश्व के लिए आश्चर्यचकित करने वाली हो लेकिन स्थानीय लोग इसे पूरी आस्था के साथ मनाते हैं।     चंपावत जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर देवीधूरा गांव स्थित है। इसी गांव में स्थित है मां बाराही देवी का मंदिर। इस मंदिर में प्रतिवर्ष रक्षा बंधन के दिन पत्थर युद्ध का ऐसा उत्सव मनाया जाता है जो हर व्यक्ति के लिए कौतूहल बन जाता है। इस पत्थर युद्ध को बग्वाल कहा जाता है।जन श्रुति व लोक मान्यता के अनुसार सैकड़ों वर्ष पहले देवीधूरा के ईलाके में 53 हजार वीर और 64 योगिनियों का आतंक था। इनके आतंक से मुक्ति के लिए लोग मां बाराही की शरण में गए। मां बाराही ने इसके बदले नरबलि मांगी। कहा जाता है कि इसके बाद लंबे समय तक यहां नरबलि दी गई। समय के साथ नरबलि की प्रथा को बंद कर एक व्यक्ति के खून के बराबर रक्त बलि स्थल पर बहाने की परंपरा शुरू हुई। जो आज के अणु युग तक जारी है। देवी मां को प्रसन्न करने के लिए आज भी यहां के लोग एक दूसरे पर पत्थर बरसाकर अपना रक्त बहाते हैं। इसमें चार खामों गुटों के लोग शामिल होते हैं। जिनमें चम्याल खाम, वालिक खाम, लमगडि़या खाम और गहड़वाल खाम शामिल हैं। चम्याल खाम में पखोटी, कनवाड़, देवाल, सिंग्वाल, मल्ला कांडा, पारस, बटुलिया, बसान गांव, वालिक खाम में वालिक, कलना डुंडी, मंगल लेख, नाई, वारी का आधा गांव, तल्ला कांडा, पजेना, आठकोटा, आगर, नौलखा, सूची जान, दनसीली, दोलोंज, भेंठी, द्यारखोली, सिमलकन्या गांव, लमगडि़या खाम में कोटला, कटना, सूनी, मथेला छाना, दाड़मी, नर्तिवेतन, सिल्पड़, गहड़वाल खाम में ढरोंज, कोट, भैंसखर्क, तिमला और कट्योली के लोग भाग लेतेे हैं। पत्थर युद्ध में सैकड़ों लोग हर साल गंभीर रूप से घायल होते हैं। इसके बावजूद यह पत्थर युद्ध इतनी आस्था का केंद्र है कि लोग पूरी भक्ति व श्रद्धा के साथ इसमें शामिल होते हैं। मंदिर समिति के मुख्य संरक्षक लक्ष्मण सिंह लमगडि़या ने बताया कि मां बाराही की पूजा अनादि काल से चली आ रही है। इस परंपरा को यहां का जनमानस पूरी आस्था के साथ निभा रहा है।                                                                          
ऐसे होता है पत्थर युद्ध- देवीधूरा के मां बाराही मंदिर में चार खामों के लोग जुटते हैं।युद्ध में भाग लेने वाले रण बांकुरों के हाथ में रिंगाल से बने छत्र रहते हैं। इसका उपयोग पत्थरों से बचने के लिए ढाल के रूप में किया जाता है। ढोल नगाड़ों के साथ सभी लोग मंदिर के मैदान में एक-दूसरे छोर पर डट जाते हैं। जैसे ही मंदिर के पुजारी शंखनाद करते हैं मैदान में पत्थरों की बौछार शुरू हो जाती है। लगभग दस मिनट तक मैदान में जमकर पत्थर चलते हैं। मंदिर के पुजारी को जैसे ही आभाष होता है कि मैदान में एक आदमी के बराबर रक्त बह चुका है तो वह पीले वस्त्र पहनकर युद्ध के मैदान में आ जाते हैं। इसके बाद युद्ध में शामिल रण बांकुरे एक-दूसरे का हालचाल पूछते हैं। इस युद्ध को देखने के लिए प्रतिवर्ष कुमाउं व गढ़वाल ही नहीं बल्कि देश के कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं।



हाईकोर्ट ने पत्थर युद्ध पर लगाई रोक देवीधूरा के मां बाराही मंदिर में होने वाले पत्थर युद्ध पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दो वर्ष पूर्व रोक लगा दी। हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद प्रशासन और मंदिर समिति की वार्ता में पत्थरों के स्थान पर फलों से बग्वाल खेले जाने को लेकर सहमति बनी। परंतु युद्ध में हिस्सा लेने वाले रण बांकुरों के बीच आस्था और विश्वास का इतना गहरा संबंध है कि परंपरा का निर्वहन करते हुए फलों के साथ पत्थर चल ही जाते हैं।
देश के मानचित्र में मिलेगी मेले को पहचानप्रदेश सरकार देवीधूरा के इस मेले को देश के मानचित्र में शामिल करने के प्रयास कर रही है। इसका उद्देश्य पर्यटन को बढ़ावा देना है। उत्तराखंड के विधान सभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल इस मेले को देश के मानचित्र में शामिल करने की बात कह चुके हैं।





 

 

क्या पत्थर युद्ध जैसी परम्पराएं 21 वीं सदी में भी जारी रहनी चाहिए?


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preeti tripathi
It is a dangerous customary and must be stopped.