Monday, December 18, 2017
सौ सालों का महामनोरंजन
शारदा शुक्ला
प्रोड्यूसर,आज तक


फिल्में सिर्फ तीन वजहों से चलती है..."इंटरटेंमेंट.....इंटरटेंमेंट....और इंटरटेंमेंट" डर्टी पिक्चर का ये डायलॉग भले ही उस समय लिखा गया जब हिंदी सिनेमा के सौ साल पूरे होने वाले थे लेकिन वास्तव में इंटरटेंमेंट वो शब्द है जिसने इन बीते सौ सालों में हिंदी सिनेमा में मंत्र का काम किया है। जब तीन मई 1913 को बंबई (मुंबई) के कोरोनेशन सिनेमा में ढुंडिराज गोविंद फाल्के यानी दादा साहब फाल्के ने करीब 40 मिनट की मूक फिल्म "राजा हरिश्चंद्र" प्रदर्शित की तो शायद उन्हें पता भी नहीं था कि वो भारतीय समाज को मनोरंजन की एक ऐसी जादू की छड़ी दे रहे है जो आगे चलकर एक रोमांचकारी इतिहास को जन्म देगी।

ये दादा साहब फाल्के का फिल्मों के लिए      जुनून ही था कि वो अपनी बीमा पॉलिसी और पत्नी सरस्वती बाई के  जेवर गिरवी रखकर फिल्म निर्माण कला सीखने के लिए लंदन गये थे। करीब 30 हजार रुपये में बनी पहली फिल्म "राजा हरिश्चंद्र 23 दिन चली और उसे देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती रही। फिल्म की मांग इतनी अधिक थी कि दादा साहब को महाराष्ट्र के गांवों के लिए फिल्म के कई प्रिंट बनवाने पड़े। इस फिल्म मेकिंग से जुड़ा सबसे मजेदार तथ्य ये है कि इस फिल्म में अभिनय करने के लिए कोई भी महिला कलाकार तैयार नहीं हुई इसलिए स्त्री चरित्रों की भूमिका भी पुरुषों ने अदा की थी।

                                                                                                                                              

 जब हम भारतीय सिनेमा के सौ गौरवशाली वर्षों का जिक्र करते है तो पारसी नाटकों से जुड़े एक शख्स बाबूराव कृष्ण राव मिस्त्री उर्फ बाबूराव पेंटर के जिक्र के बिना ये गौरवगाथा अधूरी सी लगती है। बाबूराव ने अपने भाई आनंदराव और फिर अपने शिष्य वी जी दामले के साथ मिलकर एक मूवी कैमरा बनाया,जिसकी मदद से पहली फीचर फिल्म "सैरंध्री" सन् 1920 में बनकर तैयार हुई। इस पहली फीचर फिल्म के आने के साथ ही सिनेमा जगत में एक और क्रांति हुई, इस फिल्म में महिला कलाकारों ने ही महिला किरदार निभाए भले ही वो महिलाएं तमाशों में अभिनय करने वाली ही क्यों न रही हो। इसी दौर में देश की पहली महिला फिल्मकार फातिमा बेगम भी सामने आयीं जिन्होंने अपनी कंपनी बनाकर सन् 1925 में "बुलबुले परिस्तान" का निर्माण किया। 1930 तक आते-आते बोलती फिल्मों का दौर शुरू हो चुका था। 14 मार्च 1931 को बंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में अर्देशिर ईरानी की पहली बोलती हुई फिल्म "आलमआरा" प्रदर्शित हुई ।

ये चलती फिरती और बोलती तस्वीरों का   ही जादू था कि सिनेमा का विकास इतनी तेजी से हो रहा था। 1931में ही भारत की दूसरी भाषाओं जैसे तेलुगु बांगला,मराठी, गुजराती, ओड़िया, कन्नड़ और पंजाबी में भी फिल्में बननी शुरू हो गई। फिल्मों के चंहुमुखी और तेजी से हो रहे विकास में कई तरह के दौर आए,जिनमें सामाजिक यथार्थवादी फिल्में बनी....1942 में "इंडियन पीपुल्स थिएट्रिकल एसोसिएशन" "इप्टा" की स्थापना हुई।1945 आते-आते हिंदी सिनेमा ने अंतरर्राष्ट्रीय पटल पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी। इस साल फिल्मकार चेतन आनंद कि फिल्म "नीचा नगर" फ्रांस के "कान" फिल्म समारोह में "पाम द ओर" यानी सर्वेश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार पाने वाली पहली और एकमात्र भारतीय फिल्म बनी। चालीस के दशक में हिंदी सिनेमा परिपक्व होने लगा। इस दौर में पंजाब से लेकर बंगाल तक फिल्म निर्माण के कई पहलुओं से जुड़ी हुई प्रतिभाएं बंबई में इकट्ठा हुईं और एक ऐसे सिनेमा ने आकार लिया, जिसका स्वभाव अखिल भारतीय कहा जा सकता है।



                                   फिल्म निर्देशन के लिहाज से यह दौर महबूब, के आसिफ, विमल राय, चेतन आनंद और गुरुदत्त आदि का है तो अभिनय के लिहाज से अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राजकपूर, गुरुदत्त, देव आनंद, मधुबाला, मीना कुमारी, वैजयंतीमाला, नूतन, वहीदा रहमान आदि का। इसी दौर में फिल्म संगीत भी अपनी ऊंचाइयों पर पहुंचा और उसमें देश के विभिन्न हिस्सों के स्थानीय संगीत, लोकधुनों को पिरोया गया। नौशाद, शंकर जयकिशन, सचिन देवबर्मन, रोशन, ओपी नैयर, सी रामचंद्र आदि ने अपने-अपने क्षेत्र के संगीत को आधुनिकता का जामा पहना लोगों तक पहुंचाया।
                                                                                                                                              

इस दौर की फिल्मों में सामाजिक विसंगतियों की पड़ताल कायम रही लेकिन उनके दिखाने का अंदाज काफी रूमानी हो गया। इस रूमानियत में कहीं न कहीं नेहरू युग की स्वप्नदर्शिता भी शामिल थी। जब हिंदी सिनेमा में रोमांस के कारोबार का सुनहरा दौर था, उसी समय बांग्ला जैसी भाषाओं में एक दूसरी तरह का सिनेमाई चिंतन शुरू हो रहा था। भारतीय सिनेमा की यथार्थवादी परंपरा से प्रभावित होने लगा। पश्चिम बंगाल में ऋत्विक घटक, सत्यजित रे और मृणाल सेन ने क्रमशः "नागरिक" (1952), "पथेर पंचाली" (1955) और "नील आकाशेर नीचे" (1959) के माध्यम से एक हिंदुस्तानी नव-यथार्थवाद की रचना की।



                                     व्यावसायिक रूप से असफल रहने के बावजूद घटक ने "अजांत्रिक", "मेघे ढका तारा", "सुवर्ण रेखा" और "कोमल गांधार" और राय ने "अपूर संसार", "अपराजित", "चारुलता", "जलसाघर", "अरण्येर दिनरात्रि" जैसी फिल्मों से भारतीय सिनेमा को एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया। सिनेमा के इसी मिजाज ने आगे चलकर समानांतर सिनेमा को जन्म दिया। एक वक्त ऐसा भी आया कि लगा व्यवसायिक सिनेमा को समानांतर सिनेमा लील जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 1975 तक महानायक अमिताभ बच्चन का दौर शुरू हुआ।
                                                                                                                                              

"शोले" के साथ हिंदी सिनेमा को एक अभूतपूर्व फॉर्मूला मिला और धीरे-धीरे समांतर सिनेमा नेपथ्य में चला गया। इस बीच हिंदी सिनेमा ने बुरा दौर भी देखा। 80 के दशक में कमजोर पटकथा,लचर संवाद और कामचलाऊ संगीत वाली फिल्में बनी। लेकिन ये सेल्यूलाइड की दुनिया है यहां हर दिन चमत्कार होते है। अगर फिल्मों का कला पक्ष कमजोर होने लगता है तो तकनीक आकर इसे उबार लेती है और जब तकनीक पुरानी पड़ने लगती है तो कला इसे सहारा दे देती है। वास्तव में फिल्में कला की वो दुनिया है जो तकनीक के सहारे अपनी बात कह पाती है।


                                       आज सिनेमा के सौ सालों के सफर में जब हम 100वें माइल स्टोन पर खड़े होकर पीछे देखते है तो हम भारतीय सिनेमा को तेजी से पनपते हुए बाजार के तौर पर तो पाते है,जहां हर रोज पांच फिल्में बनती है। फिल्म उद्योग के नाम पर तो हम हॉलीवुड से कुछ साल पहले ही आगे निकल गए थे लेकिन गलोबलाइजेशन के दौर में विश्व पटल पर भारतीय सिनेमा आज भी कहीं नहीं टिकता। आज भी हम तकनीक के मामले में हॉलीवुड से 20 साल पीछे चलते है। हमारे यहां "रोबोट", "रा. वन" और "बाहुबली" जैसी महंगी चमत्कारिक फिल्में बन तो रहीं हैं,लेकिन हॉलीवुड की अवतार जैसी फिल्मों के सामने ये कहां टिकती है आप खुद तय कर लीजिए। कुछ कुछ यहीं हाल संगीत के क्षेत्र में है। ए.आर रहमान एकमात्र ऐसे संगीतकार है जो नई बीट्स और नए स्टूमेंट्स के साथ एक्सपेरीमेंट करके अंतर्राष्ट्रीय पहचान बना पाए है।
                                                                                                                                             बिजनेस प्वाइंट ऑफ व्यू से भी हम हॉलीवुड से बहुत पीछे है ताजा आंकड़े बताते है कि जहां हॉलीवुड का कुल रेवेन्यू 51 बिलियन डॉलर रहा वही भारतीय फिल्म उद्योग का कुल रेवेन्यू सिर्फ 1.3 बिलियन डॉलर पर ही आकर रुक गया। जिसकी सबसे खास वजह ये है कि भारतीय सिनेमा को पूरी दुनिया में सिर्फ भारतीय ही देखते है,जबकि हॉलीवुड फिल्में लगभग सभी देशों में देखी जाती है। तो आज अगर हम हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे हो जाने का जश्न मना रहे है तो हमें अपनी कमियों पर भी गौर करना चाहिए। सिनेमा के भावनात्मक पहलू को बरकरार रखते हुए हमें तकनीक की दिशा में तेजी के साथ आगे बढ़ना होगा तभी हम सही मायनों में सफल सिने प्रेमी कहे जा सकेंगे। फिलहाल फाल्के की हरिश्चंद्र फैक्ट्री से निकले भारतीय सिनेमा को उसकी जन्मशती पूरी होने पर बधाई।

 

   Comments
Ravi Kumar
It is very nice story and very nice writing.