Tuesday, September 25, 2018
चीन की ' कामशक्ति ' का राज़
भक्त दर्शन पांडे
वरिष्ठ पत्रकार,पिथौरागढ़

भारत के उच्च हिमालयी क्षेत्र में एक ऐसी जड़ी -बूटी पाई जाती है जो शक्तिवर्द्धक होने के साथ ही कामोत्तेजक भी है। " यारसा गंबू " के नाम से पहचानी जाने वाली इस जड़ी-बूटी को पिछले कई वर्षों से भारत से तस्करी कर नेपाल के रास्ते चीन के बाजार तक पहुंचाया जा रहा है। स्थानीय लोग इसे " कीड़ा ज़ड़ी " भी कहते हैं । पिछले डेढ़ दशक में यारसा गंबू की कीमत 50 हजार रुपये से बढ़कर 16 लाख रूपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। इसका उपयोग शक्तिवर्धक दवाएं बनाने के अलावा खांसी, अस्थमा और ह्दय रोग में किया जाता है।

यारसा गंबू में विटामिन बी 12, कार्डिसेपिक अम्ल, इर्गोस्टाल और डीफाक्सोनोपीन सहित तमाम शक्तिवर्द्धक तत्व पाए जाने के चलते इसका सबसे अधिक इस्तेमाल कामोत्तेजक दवाएं बनाने में किया जाता है। कीड़ा जड़ी की सबसे बड़ी मंडी चीन में बताई जाती है।  चीन में यारसा गंबू की मदद से कई तरह की काम वर्धक दवाएं बनायी जाती है जिसके लगातार बढ़ते बाजार ने इस जड़ी बूटी की कीमत में भी भारी उछाल ला दिया है ।



यारसा गंबू का इतिहास

उत्तराखंड और अरुणांचल में हजारों फुट की उंचाई पर मिलने वाले यारसा गंबू की पहचान डेढ़ दशक पूर्व तक भारत में किसी को नहीं थी। जबकि तस्कर इसे चुपचाप निकालकर नेपाल के रास्ते चीन की मंडी तक पहुंचा रहे थे। इसका खुलासा उस समय हुआ जब 1998 में पिथौरागढ़ और नेपाल की सीमा पर भालू की पित्ती के तस्करों की तलाशी के दौरान दो नेपाली व्यापारियों से यारसा गंबू बरामद हुआ। उस समय इसका अंतर्राष्ट्रीय मूल्य 50 हजार रुपये प्रति किलो था। इस समय इसकी कीमत 15 से 16 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी है।

क्या है यारसा गंबू

जंतु विज्ञान में कार्डइसिपस सिनेसिइस के नाम से पहचानी जाने वाली यह कीड़ा जड़ी जीव और पौधे का अनोखा मेल है। कार्डइसिपस सिनेसिइस पौधे का जन्म हैपीएलम वीरेसिनस जंतु के लार्वा के सिर पर होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इटोमोफिलस समूह के अंतर्गत हाइपोसेडेल्ज गण के स्कोलेकोस्पोरेसी परिवार का यह सदस्य काले रंग का तंतुकार कवक है। यह कवक हेपियेलुस गण के लार्वा पर परजीवी के रूप में संक्रमण करता है। बसंत ऋतु की समाप्ति पर होने वाले इस संक्रमण से लार्वा की मौत हो जाती है और कवक फूंटिंग बाडी के रूप में लार्वा के मुख से बाहर निकल आता है। नीचे कीड़ा और उपरी भाग में घास जैसा दिखाई देने से स्थानीय लोगों ने इसे कीड़ा जड़ी नाम दे दिया। कीड़ा जड़ी के प्रचलन में आने और इसके महत्व को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इसे लैब में विकसित करने का प्रयास किया परंतु लैब में उगाए गए यारसा गंबू से सभी नेचुरल तत्व गायब मिले।

यारसा गंबू का प्राप्ति स्थान
यारसा गंबू उच्च हिमालयी क्षेत्र में लगभग हजारों फीट की ऊंचाई में पाया जाता है। अरुणांचल के अलावा यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी में मिलता है। पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी और धारचूला में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसका सर्वाधिक प्राप्ति स्थान 15 से 30 डिग्री के कोण वाले बुग्यालों में होता है। बर्फ पिघलने के बाद मई माह से इसका दोहन किया जाता है। बर्फ के नीचे मिट्टी में दबे कीड़े के सिर पर उगी घास नुमा फंफूद ही दिखाई देती है। कीड़ा जड़ी की पहचान होने के बाद स्थानीय ग्रामीण भी इसे निकालकर बेचने का कार्य कर रहे हैं। कीड़ा जड़ी मई से लेकर अगस्त माह तक निकाली जाती है। इसे निकालने में नेपालियों को अधिक दक्ष माना जाता है। इसलिए आज भी कीड़ा जड़ी को निकालने के लिए तस्कर नेपालियों की ही मदद लेते हैं।
 
खतरे में जैव विविधता
कीड़ा-जड़ी पर शोध करने वाले प्रो.सीएस नेगी का कहना है कि यारसा गंबू की पहचान के बाद पिछले डेढ़ दशक से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लोगों की आवाजाही बढ़ गई है। प्रतिवर्ष हजारों लोगों के इन क्षेत्रों में पहुंचने से बुग्यालों को खतरा पैदा हो गया है। यहां तक कि जल्दी मालामाल होने की लालसा में इस कीड़ा जड़ी का अपरिपक्व स्थिति में ही दोहन कर दिया जा रहा है। इससे नए अंडे विकसित नहीं हो पाते हैं। ऐसे में हर वर्ष यारसा गंबू में कमी आ रही है। यदि इसी तरह दोहन जारी रहा तो हिमालयी क्षेत्र से प्राकृतिक कामवर्द्धक जड़ी समाप्त हो जाएगी।  दिलचस्प बात तो ये है कि यारसा गंबू का औषधि के रूप में कैसे इस्तेमाल हो इसकी जानकारी भारत में उपलब्ध नहीं है ।  जबकि चीन में ये कामवर्धक जड़ी के रूप में दवाओं में एक अहम तत्व के रूप में खूब प्रयोग हो रही है ।

यारसा गंबू के बारे में पिथौरागढ़ के डीएफओ डा.आईपी सिंह का कहना है कि - यारसा गंबू के सरकारी स्तर पर कोई रेट तय नहीं हैं। इसके लिए भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है। इस प्रस्ताव में चीन सरकार से वार्ता कर यारसा गंबू के रेट तय करने के सुझाव दिए गए हैं। इस प्रस्ताव के तहत कीड़ा-जड़ी का वैध रूप से दोहन करने और संग्रहण कर वन विभाग द्वारा क्रय करना था। इससे ग्रामीणों को उचित रेट मिलता और भारत से वैध रूप से चीन भेजा जाता। परंतु कोई नीति नहीं होने के कारण ग्रामीणों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। इसके अलावा भारत को प्रतिवर्ष बड़ा राजस्व घाटा भी उठाना पड़ रहा है । 

 

 

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