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Thursday, April 26, 2018
स्वास्तिका के वैज्ञानिक और तांत्रिक महत्व पर विशेष आलेख
रघोत्तम शुक्ल
लेखक,कवि एवं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी

चिन्हों का एक तांत्रिक और वैज्ञानिक महत्व होता है । स्वस्ति या कल्याण का प्रतीक स्वास्तिक चिन्ह है । इसे स्वास्तिका कहते हैं । धर्म कार्यो में स्वस्ति वाचन अवश्य किया जाता है तथा मंगल कलश और देव प्रतिभाओं पर स्वास्तिका बनाई जाती है।
                                                             स्कन्द पुराण के उत्तरखंड में रामायण को नावाह्न श्रवण की महिमा  का वर्णन है वहां लिखा है कि पहले स्वस्ति वाचन करके फिर यह संकल्प करें कि हम नौ दिन तक रामायण की अमृतमयी कथा सुनेंगे ।  भगवान श्रीराम जब विश्वामित्र के यज्ञ के रक्षार्थ जाने लगे तो उनके मंगल विधान हेतु माता-पिता और गुरु वशिष्ठ ने 'स्वास्तिवाचन' किया ।

     कृत स्थ स्त्ययनं मात्रा पित्रा दशरथेन च । पुरोधसा वसिष्ठेन मंगलैरभियांत्रियम्।

( वाल्मीकि रामायण/बाल काण्ड/सर्ग- 22 )



                                                             मंगल ध्वनि निकालने वाला एक स्वस्तिक वाद्ययंत्र भी होता है।  श्रीराम को भारत द्वारा राज्य वापस दिये जाने के अवसर पर स्वस्तिक बजाये जा रहे थे और  मंगल गीत गाये जा रहे थे।

                                                         गीता के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण के विराट रूप के दर्शन हुए है। 21 वें श्लोक में अर्जुन देखते हुए कहते हैं- ' हे गोविंद सब देवता आप में ही प्रवेश कर रहे है और कई हाथ जोड़े आप के गुणों का गान कर रहे  हैं,  महर्षि और सिद्धों के समूह कल्याण हों ( स्वस्ति) कहकर उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति कर रहे हैं-

                      'परिलक्षित हो रहा है करते तब देह में देव समूह प्रवेश हैं।
                     उनमें कुछ हो भयभीत करें कर जोड़ गुणों का बखान विशेष है।
                     सब सिद्धि महाऋिष माधव आपका देख रहे ये विचित्र सा वेष है।
                    कह ' स्वस्ति' महानता का भवदीय रहे कर वे कलगान वृजेश हैं ।।'
 
                    ( श्रीमद्भगवतगीता के हिंदी पद्यानुवाद गीता दोहन 11 से)
                                                     
                                                       इस प्रकार कल्याण और मंगल, जिसका सर्वत्र वर्णन भी है और आवश्यकता भी , चिन्ह रुप में स्वस्तिका का रूप ले लेता है। यह शुभ तो है ही वराह पुराण अध्याय 181 के अनुसार वृद्धि की भी सूचक है।  काष्ठ प्रतिभाओं के निर्माण, पूजन की विधि बताते हुए उक्त अध्याय में भगवान की प्रतिमा पर  स्वास्तिक बनाने की बात कही गयी है।        
                                                      हिटलर की ध्वजा पर उलटी स्वास्तिका बनी थी जो उसके हृास और विनाश का  कारण बनी। शुभ और अशुभ चिन्हों का विशिष्ट स्थानों पर  बना होना अपना महत्व रखता है और उनके दर्शन मात्र का गहन वैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है।
                                                                     
                                        

 

 

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