Monday, December 18, 2017
देह का पराविज्ञान
रघोत्तम शुक्ल
लेखक,कवि एवं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी


अध्यात्म ग्रंथों और यौगिक क्रियायों द्वारा किए गए शोधों के अनुसार शरीर तीन
स्तरों और पंच कोषों वाला है। तीन स्तर हैं-स्थूल, सूक्ष्म और कारण तथा पंच कोष
हैं-अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय तथा आनंदमय। स्थूल देह के भीतर सूक्ष्म
देह, सूक्ष्म के भीतर कारण देह और कारण देह के भीतर आत्मा विराजमान है।
स्थूल देह पंच महाभूतों अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से बना है।
मज्जा, अस्थि, मेद, मांस, रक्त, चर्म और त्वचा नामक सप्त धातुएं इसके सृजन
के हेतु हैं। यही अन्नमय कोष है।



                                                 
                                                    पृथ्वी रूप भूत इसका अधिपति है। सूक्ष्म शरीर में सूक्ष्म अथवा अपंचीकृत, पांच कर्मेन्द्रियां अर्थात् वाक, पाणि, पाद, गुदा और उपस्थ,पांच ज्ञानेंद्रियां अर्थात् श्रवण, त्वचा, नेत्र, घ्राण एवं रसना, पंचप्राण यानी प्राण अपान,व्यान, उदान और समान तथा अविद्या, काम व कर्म।


                                                   यह शरीर मनोमय, प्राणमय और विज्ञानमय कोषों से युक्त है। मन, प्राण और बुद्धि क्रमश: इनके अधिपति हैं। कारण देह सत, रज, तम इन गुन गुणों से बना है। कारण शरीर की अधिष्ठात्री अविद्या है। जीव यहीं आनंद सिंधु में डूबा रहता है। जागृत काल में स्थूल शरीर से व्यवहार होता है। स्वप्नावस्था में सूक्ष्म शरीर से तथा सुषुप्ति में कारण शरीर या अविद्या से व्यवहार होता है। सोई हुई अवस्था में जीव ब्रह्लीन होने पर भी अपनी स्वतंत्रता नहीं खोता और पुन: अपना स्वभाव लेकर जागृत हो जाता है।


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                                               आत्मा सच्चिदानन्द स्वरूप और निर्मल है, किंतु त्रिविध देह रूप आवरण के दोष से दूषित होकर और दुखी प्रतीत होता है। सूक्ष्म शरीर मन को प्रसन्न, सद्भावयुक्त, अध्यात्म विषयों में चिंतनरत, शुभ विचारलीन रखने, बुद्धि को आत्मा प्राप्ति और सुखप्रद निश्चय करने में लीन रखने से शुद्ध होता है।
                                  
                                            
                                          जब आत्म प्राप्ति ही एकमात्र चेष्टा हों तो समझिये कारण देह पूर्ण स्वच्छ हो गई। आदि शंकराचार्य के अनुसार इस आत्मा को अखंड, बोध स्वरूप, सत, नित्य, सर्वगत, सूक्ष्म, भेद रहित और अपने आपसे सर्वथा अभिन्न मानकर व्यक्ति पापरहित निर्मल और अमर हो जाता है।


 

 

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