Monday, December 18, 2017
कुण्डलिनी रहस्य
रघोत्तम शुक्ल
लेखक,कवि एवं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी


साधक के लिए कुण्डलिनी और उसका जागरण सदा से जिज्ञासा का विषय रहा है । यह
"शक्ति" और सर्वोच्च वैश्विक ऊर्जा है ,जिसे "शिवसूत्र" में परब्रह्म की "इच्छा शक्ति उमा
कुमारी " कहा गया है । जापान में इसे "की" चीन में "ची"तथा इसाई धर्म ग्रन्थों में "होली
स्पिरिट" कहा गया है । शरीर में 72000 नाड़ियां होती हैं । इनमें इड़ा , पिंगला और
सुषुम्ना, प्रधान हैं । ये मेरुदंड या रीढ़ के बीच में स्थित होकर संपूर्ण नाड़ी तंत्र एवं तन
को नियंत्रित करती हैं । इसी के नीचे "मूलाधार चक्र" में तीन इंच लंबी कुण्डलिनी चक्र रूप
अर्थात कुण्डली मारे स्थित रहती है ।




सुषुम्ना के अंदर भी "चित्रिणी" नामक एक नाड़ी है । कुण्डलिनी जागृत होने पर इसी चित्रिणी
के अंदर से सीधी होकर ऊपर को जाकर "सहस्रार या शिवस्थान"पर पहुंचती है । इन सबकी
स्थिति इतनी सूक्ष्म है कि विज्ञान या चिकित्सा शास्त्र से दर्शनीय या ग्रहणीय नहीं है ।
साढ़े तीन चक्र मारे बैठी कुण्डलिनी जागरण के विविध उपाय हैं - यथा उत्कट भक्ति ,
यौगिक क्रियाएं , मंत्रजप ,गुरु द्वारा शक्तिपात और कभी-कभी पूर्व जन्मों की संसिद्धि के
आधार पर "अकस्मात" । जागृत होने पर तत्काल पूर्व कर्मों के प्रभाव बाहर आ जाते हैं तथा
व्यक्ति विक्षिप्तों जैसा आचरण करने लगता है ।



 योग्य गुरू की सहायता बिना कुण्डलिनी जागरण खतरनाक सिद्ध हो सकता है । प्रारंभ में
तन्द्रा सी अनुभूत होती है और नदी,देवता,साधु,संत,अंत:दृश्य में आते हैं । वह स्वप्नावस्था
नहीं होती है । वह जागृत होकर उपरिगामी होती है और सुषु्म्ना के छहों चक्रों - मूलाधार,
स्वाधिष्मान, मणिपूर ,अनाहत ,विशुद्ध और आज्ञा का भेदन करती है । आज्ञा "चक्र"दोनो
भौहों के बीच का स्थान है जिसे "त्रिपुटी" भी कहते हैं । तदनन्तर "नाद"और"बिन्दु"उसका
गन्तव्य है । बिन्दु सहस्त्रों ग्रन्थियों वाला सहस्त्रार है जहां त्रिकोण में "परमशिव"विराजमान हैं ।
 

वहां कुण्डलिनी के पहुंचने पर सहस्त्रों सूर्यों का शीतल नीला प्रकाश दर्शित होता है । साधक
परमानन्द में डूब जाता है । गूंगे का गुड़ है । कबीर कहते हैं - "उनमनि चढ़ा मगन रस पीवै"।
"हंस", "सोहं" , "हूं क्षूं" के उच्चारण तथा खड़े होकर अपनी एड़ियों से मूलाधार पर हल्के प्रहार
भी कुण्डलिनी जागरण में सहायक होते हैं । मानव मात्र के लिए किसी भी लौकिक सुख से
 ऊपर ब्रह्मानंद होता है ,जो उसे कुण्डलिनी जागरण से प्राप्त होता है, तब वो पूर्णकाम और
धन्य हो जाता है । ऐसा आत्मज्ञानी व्यक्ति जीवन मुक्त होकर ब्रह्म से तादात्म्य करता है
और वसंत ऋतु के समान लोकहित करता हुआ दूसरों को भी तारता रहता है ।

 

 

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