Monday, December 18, 2017
माटी का साइंटिस्ट
ब्यूरो रिपोर्ट

गुजरात के राजकोट निवासी और पेशे से कुम्हार मनसुखभाई ने अपने हुनर और कुछ अलग और नया करने की चाहत से न सिर्फ कुम्हार के परंपरागत पेश को नई उंचाइयां दिलाईं बल्कि ढेरों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान भी हासिल किए।


राष्ट्रीय अवार्ड और राष्ट्रपति अब्दुल कलाम और प्रतिभा पाटिल की प्रशंसा पा चुके मनसुख भाई को हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मैग्जीन फोर्ब्स ने ग्रामीण भारत के शक्तिशाली लोगों की सूची में स्थान दिया है। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने तो उन्हें ‘ग्रामीण भारत का सच्चा वैज्ञानिक’ के विशेषण से भी नवाज़ा था। मनसुख भाई कहते हैं “लोग गांवों के परंपरागत व्यवसाय के खत्म होने की बात करते हैं, जो गलत है। अभी भी हम ग्रामीण व्यवसाय को जिंदा रख सकते हैं बस उसमें थोड़ी सी तब्दीली करने की जरूरत है।”



आखिर कुम्हार के परंपरागत पेशे में क्या बदलाव किए मनसुखभाई ने कि उन्हें इस स्तर पर तारीफ मिली ?दसवीं कक्षा तक पढ़े मनसुखभाई ने साल 1988 में ऋण लेकर मिट्टी के तवे बनाने का काम शुरू किया। एक तरफ 30 हज़ार रूपये के ऋण को चुकाने की चुनौती तो दो दूसरी तरफ फैसले को सफल बनाने की चुनौती। मनसुखभाई बताते हैं कि उनका अनुमान था कि मिट्टी के बर्तनों को हाथों से आकार देने वाला कुम्हार एक दिन में सौ तवे बना सकता है। लेकिन पहले दिन वो सिर्फ 50 तवे ही बना सके। लिहाज़ा उन्होंने अपनी फैक्ट्री में हैंड प्रेस मशीन लगाई। यह एक दिन में सात सौ तवे बना सकता था। इसके बाद उन्होंने तवों को कलरफुल बनाकर, तवे में कलात्मकता लाने की कोशिश की। इससे बिक्री एकाएक बढ़ी। ट्रेडर्स की नजर में भी आए मनसुखभाई। तवे की डिमांड शहरों से भी आने लगी। लिहाज़ा कारखाने में उन्होंने कुछ अन्य कारीगरों को भी रख लिया और भरपूर उत्पादन करने लगे।


वर्ष 1995 में उनकी मुलाकात राजकोट के व्यापारी चिरागभाई से वांकानेर में हुई। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो चिकनी मिट्टी के बर्तन उन्हें थोक में उपलब्ध करा सके। चिरागभाई एक्सपोर्टर थे। वे अपना माल केन्या के नौरोबी सहित कई स्थानों पर भेजते थे। मनसुखभाई उन्हें अपने साथ अपने कारखाने लेकर आए अपने काम को दिखाया, साथ ही प्रयोग के तौर पर मिट्टी से बनाए अपने नए वाटर फिल्टर भी उनको दिखाया। इस वाटर फिल्टर को देखकर चिरागभाई काफी प्रभावित हुए और उन्होंने पांच सौ पीस का आर्डर दिया। फिल्टर का अहमदाबाद में लगी प्रदर्शनी में प्रदर्शन भी किया गया। वर्ष 2001 में उन्होंने इसका पेटेंट कराया और यहीं से शुरू हुआ ‘मिट्टीकूल’ का सफर । उनके मिट्टी का वाटर फिल्टर पानी को एक माइक्रोन तक प्यूरिफाई कर सकता है।


इसके बाद साल 2005 में उन्होंने मिट्टी के फ्रिज का निर्माण किया। एक वैज्ञानिक उनके कारखाने का निरीक्षण करने आया और मिट्टी के इस फ्रिज को देखकर इतना प्रभावित हुआ कि 100 पीस का ऑर्डर दिया और एडवांस में दो लाख रूपये भी पकड़ा दिए। उनके मिट्टीकूल फ्रिज की तारीफ भी देश भर से होने लगी। उनके रेफ्रिजरेटर में तीन दिनों तक दूध और सप्ताह भर तक सब्जियों को सुरक्षित रखा जा सकता था।


मिट्टी का रेफ्रिजरेटर बनाने के बाद ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने उनके हुनर को सम्मानित भी किया।  वर्ष 2008 में सात्विक ट्रेडिभान फूड फेस्टिवल में वो मिट्टी के बने प्रेशर कुकर भी लेकर पहुंचे। इन प्रशंसाओं और काम की प्रगति को देखकर मनसुखभाई प्रजापति बड़े उत्साहित रहते हैं। अब वो ऐसा घर बनाने की कोशिश में हैं जो बगैर बिजली के 24 घंटा ठंडा रहे। वो सिर्फ नेचुरल लाइट का इस्तेमाल करके मकान को ठंडा रखने की कोशिश कर रहे हैं।


नई तकनीक को सीखने की ललक और कुछ नया समझने के उत्साह में उन्होंने अपने कार्यों के लिए एक  वेबसाइट भी बनाई है मिट्टीकूल डॉट काम।

मनसुखभाई की साइट भी विजिट करें - https://mitticool.com/

इस पर वो लोगों से प्रतिक्रिया लेते हैं, अपने काम के बारे में बात करते हैं,  कौन सा नया उत्पाद तैयार कर रहे हैं,इसके बारे में भी जानकारी देते हैं।

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