Monday, August 26, 2019
जो लड़े दीन के हेत...
आशुतोष शुक्ला
वरिष्ठ पत्रकार

भारत में तुर्कों के आगमन एवं उनके शासन की शुरुआत के साथ ही समाज में कई

प्रकार के सामाजिक,राजनीतिक एवं धार्मिक परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे थे । इन

परिवर्तनों के प्रति सर्वप्रथम प्रतिक्रिया उच्च वर्गों द्वारा प्रस्तुत की गई गई जो कि

काफी सीमित रही परन्तु 13वीं तथा 14वीं शताब्दी में इस की तरंगे जनसामान्य

विशेषकर निम्न वर्ग तक जा पहुंची थीं। इन शताब्दियों में विदेशी संस्कृति के प्रति

जो प्रतिक्रिया उपजी उसे भक्ति आंदोलन की संज्ञा दी जाती है । भक्ति आंदोलन

मात्र विदेशी संस्कृति के प्रतिक्रिया स्वरूप ही नहीं बल्कि उससे समन्वय बैठाने का

भी आंदोलन था ।



भक्ति आंदोलन ने मुस्लिम सूफी मत के साथ भारतीय धार्मिक मान्यताओं का

संगम कराने का सुंदर कार्य किया था । इसके अलावा भक्ति आंदोलन ने हिंदू धर्म

की अनेक कुरीतियों पर भी कुठाराघात किया। इसी भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभों

एवं सूत्रधारों में हम कबीर, रैदास, दादू, चैतन्य महाप्रभु के साथ-साथ श्री गुरु

नानक का नाम भी गणना में शामिल करते हैं । गुरु नानक अपने इन समकालीन

संतों से एक मायने में गुरुतर थे क्योंकि मात्र वही थे जिन की शिक्षाओं के आधार

पर एक धर्म ने जन्म लिया और वह था सिख धर्म ।

सिख धर्म के बारे में और जानें -


नानक सिक्खों के प्रथम गुरु तलवंडी के एक खत्री परिवार में जन्मे थे । मात्र 30

वर्ष की आयु में संत होने वाले नानक निर्गुण ईश्वर के उपासक थे । वे जाति प्रथा

के खिलाफ थे तथा उन्होंने कई मुस्लिम संतों की संगति भी प्राप्त की और अपने

उदारवादी होने का प्रमाण दिया । उन्होंने अपने प्रवचनों में इस्लाम की कई अच्छी

बातों का समावेश किया। नानक ने अपने प्रवचनों में ईश्वर के लिए "प्रीतम" ,

"अल्लाह" , "खुदा" , "राम" , "गोविंद" , "हरि", "मुरारी", आदि शब्दों का

प्रयोग किया । ईश्वर के लिए इन शब्दों के प्रयोग से यह बात स्पष्ट है कि नानक

हिंदू मुस्लिम तथा नवोदित सिख संप्रदाय के आपसी मेल मिलाप और समन्वय की

व्यवहारिक आवश्यकता को महसूस करने वाले एक सेकुलर, समाजशास्त्री धार्मिक

नेता थे।
 


यदि इस वेबसाइट की सामग्री आपको अच्छी लगी हो तो आप हमें

9643407510 पर paytm करके आर्थिक अनुदान भी दे सकते हैं ।

आपका सहयोग हमें अपनी गुणवत्ता बनाये रखने में अमूल्य

सहयोग दे सकता है ।


                                                   नानक ने पांच बातों के अनुपालन पर बल

दिया - "दान" , "स्नान" , "सेवा" ,

"सिमरन" । एक मनुष्य के लिए यह नानक

के अनुसार अपेक्षित था कि वह निस्वार्थ सेवा

की भावना रखें तथा ईश्वर का स्मरण सदैव

करें । वे कर्मकांड के घोर विरोधी थे । इसी

कारण आज भी सिख धर्म कर्मकांड से दूर

तथा कर्मवाद के ज्यादा नजदीक है। नानक

अपने समय से काफी आगे सोचने वाले संत

थे तथा स्त्री पुरुष समानता के पक्षधर थे ।



इन विचारों को बीसवीं शताब्दी में जाकर ही कहीं मान्यता मिल सकी जो कि

नानक ने अपने ही समय में व्यक्त किए थे । अपने विचारों सिद्धांतों एवं शिक्षाओं

से उन्होंने सिख संप्रदाय को समाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक रूप से एक विशिष्ट

प्रकार के समुदाय के रूप में संगठित होने की नींव डाल दी ।


अमृतसर के बारे में और जानें-




गुरु रामदास ने चौथे गुरु के रूप में गुरु पद संभाला । अमृतसर शहर की स्थापना

की।  रामदास ने मंदिर निर्माण हेतु सम्राट अकबर से भूखंड उपलब्ध कराने का

आग्रह किया और एक बार पुनः सम्राट ने गुरु की इच्छा पूर्ति की । इसी भूखंड पर

पांचवें गुरु अर्जुन देव ने पवित्र हर मंदिर का निर्माण करवाया था जो आज भी

सिखों का परम पवित्र तीर्थ स्थल है ।




श्री हरमंदिर साहिब की साइट भी विजिट करें -



गुरु अर्जुन ने पुनः सभी पूर्व गुरुओं की स्तुतियों को "आदि ग्रंथ" शीर्षक से एकत्र

किया । गुरु अर्जुन ने बागी मुगल शहजादे खुसरो को पनाह में लिया और उसे

अपना आशीर्वाद प्रदान किया जिससे दशकों से चले आ रहे मुगल सिख संबंधों की

मिठास में कड़वाहट आ गई । मुगल सम्राट जहांगीर ने गुरुजी को गिरफ्तार करवा

कर फांसी दे दी । यही वह घटना थी जहां से सिख समुदाय सैनिक प्रवृत्तियों की

ओर मुड़ गया ।



इस लेख की अगली किश्त पढ़िये इस लिंक में-

   Comments


It is very nice story and very nice writing.

Ravi Kumar

Very Good and Healthy Article

Abhishek Tewari

Very Good and Healthy Article

Abhishek Tewari

Very Good and Healthy Article

Abhishek Tewari

Chalo sab loog Surkanda Devi

Abhishek Tewari